अब अपनी मर्जी से करोड़ों के काम नहीं करवा पाएंगे महापौर
भोपाल। नगरीय निकाय चुनावों की आहट के बीच राज्य सरकार ने एक ऐसा बड़ा प्रशासनिक दांव चला है, जिससे प्रदेश के नगर निगमों के मुखियाओं (महापौरों) के अधिकार सीमित हो जाएंगे। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने स्पष्ट आदेश जारी किया है कि आगामी बजट में महापौर निधि के लिए कोई विशेष प्रावधान न किया जाए। सरकार का तर्क है कि जिस निधि के नाम पर अब तक करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे थे, मूल अधिनियम में उसका कोई कानूनी आधार ही नहीं है।
नगरीय विकास विभाग के उप सचिव प्रमोद कुमार शुक्ला द्वारा जारी पत्र में नगर पालिक निगम अधिनियम 1956’ का हवाला दिया गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि अधिनियम के अध्याय 7 में बजट तैयार करने के स्पष्ट नियम हैं, लेकिन इसमें कहीं भी ’महापौर निधि’ का उल्लेख नहीं है। भविष्य के सभी बजट लेखा एवं वित्त नियम 2018 के तहत ही तैयार किए जाएं। नियमों से बाहर जाकर किसी भी प्रकार के वित्तीय प्रावधान को अब मंजूरी नहीं मिलेगी।
इंदौर और भोपाल के महापौरों को सबसे बड़ा झटका
इस आदेश का सीधा असर प्रदेश के बड़े महानगरों के विकास कार्यों और वहां के महापौरों के रसूख पर पड़ेगा। अब तक ये महापौर अपनी मर्जी से पार्षदों की सिफारिश या जनहित के कार्यों के लिए सीधे फंड जारी कर देते थे। भोपाल में प्रस्तावित बजट 10 करोड़ रुपये, इंदौर में 10 करोड़ रुपये और ग्वालियर में 10 करोड़ की निधि प्रस्तावित की है।
बढ़ेगा नौकरशाही का दखल
सरकार का मानना है कि बजट में पारदर्शिता के लिए अधिनियम का पालन अनिवार्य है। अगले साल होने वाले नगरीय निकाय चुनावों से पहले इसे प्रशासनिक कसावट के तौर पर देखा जा रहा है। अब सभी निगम कमिश्नरों को बजट नियमों के दायरे में रहकर बनाने की जिम्मेदारी दी गई है, जिससे नौकरशाही का दखल बढ़ेगा।