बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव को भारत एक अलग तरह की उम्मीद और हल्की चिंता के साथ देख रहा ह
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव को भारत एक अलग तरह की उम्मीद और हल्की चिंता के साथ देख रहा है. आम तौर पर भारत किसी पड़ोसी देश के आम चुनाव पर इतनी सावधानी से नज़र नहीं रखता.
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इस बार के चुनाव से ऐसे नतीजे आ सकते हैं, जिनसे भारत को पिछले करीब बीस सालों में जूझना नहीं पड़ा है.
पहली बात, कई सालों बाद बांग्लादेश में ऐसी सरकार बनने जा रही है जिसमें शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग सत्ता में नहीं होगी.
भारत बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकारों के साथ काम करने का आदी हो चुका था, लेकिन अब उसे बिल्कुल नई राजनीतिक हक़ीक़त का सामना करना है.
दूसरी बात, भारत बारीकी से देख रहा है कि क्या तारिक़ रहमान की अगुवाई वाली बीएनपी अपने दम पर सरकार बना पाएगी- या उसे जमात-ए-इस्लामी को गठबंधन में शामिल करना पड़ेगा.
2001 से 2006 तक बीएनपी-जमात गठबंधन ने खालिदा ज़िया के नेतृत्व में बांग्लादेश पर शासन किया था. भारत के लिए वह दौर सहज़ तो कतई नहीं था, हालांकि उसके बाद बांग्लादेश की राजनीति काफी बदल चुकी है.
तीसरी बात, चाहे जमात-ए-इस्लामी सरकार का हिस्सा बने या एक ताक़तवर विपक्ष के रूप में उभरे- इसमें शक की गुंजाइश नहीं कि नई संसद में उसकी भूमिका काफी प्रभावशाली रहेगी.
कई दशकों से भारत जमात को एक तरह की 'लाल रेखा' की तरह देखता आया है.
अब विश्लेषकों की नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि भारत इस पार्टी से कैसे तालमेल बिठाए. वैसे दिल्ली में यह संकेत भी मिलने लगे हैं कि किसी न किसी स्तर पर बातचीत की शुरुआत हो चुकी है.
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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने वाले हैं.
इन सबके परे, भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई बांग्लादेशी सरकार, भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा को लेकर क्या रुख अपनाएगी. दिल्ली के विश्लेषक इसे बेहद संवेदनशील मुद्दा बताते हैं. उनके मुताबिक इस मुद्दे पर भारत समझौते की कोई गुंज़ाइश नहीं मानता.
ख़ास बात यह है कि बांग्लादेश के पिछले तीन चुनावों की तुलना में इस बार भारत के 'हस्तक्षेप' वाली कोई बड़ी शिकायत सुनाई नहीं दी. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भारत ने इस बार पूरी चुनावी प्रक्रिया से जानबूझकर दूरी बनाए रखी.
कई जानकार मानते हैं कि भारत के इस संयम की वजह 2024 में बांग्लादेश में हुए जन आंदोलन का अनुभव है, जिसमें भारत विरोधी नाराज़गी साफ़ झलक रही थी. उस दौरान शेख़ हसीना के साथ-साथ भारत के ख़िलाफ़ भी गुस्से भरे नारे लगाए गए थे.
करीब डेढ़ साल तक 'भागीदारी वाले' चुनाव की मांग करने के बावजूद, जब आख़िरकार अवामी लीग चुनाव लड़ ही नहीं पाई, तब भी भारत ने सामान्य कूटनीतिक विरोध तक नहीं जताया.
अब भारत की पारंपरिक सहयोगी, अवामी लीग का राजनीतिक भविष्य, काफ़ी हद तक इस बात पर टिका है कि अगली सरकार कैसी बनती है.
12 फरवरी के चुनाव से जुड़ी यही अनिश्चितताएं हैं, जिन्होंने इस बार के बांग्लादेश चुनाव को भारत के लिए इतना अहम बना दिया है.
इमेज कैप्शन, रीवा गांगुली दास के अनुसार भारत बांग्लादेश में एक स्थिर, लोकतांत्रिक सरकार देखना चाहता है
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास का मानना है कि इस चुनाव से भारत की सबसे बड़ी उम्मीद यह होगी कि बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता लौटे.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "हम जानते हैं कि 5 अगस्त, 2024 से हमारे रिश्तों को बड़ा झटका लगा है."
"खुद बांग्लादेश भी कई तरह के आंतरिक झटकों और हंगामों के दौर से गुज़र रहा है. वहां अंदरखाने भारी राजनीतिक उथल-पुथल जारी है. उम्मीद है कि यह चुनाव कम से कम कुछ हद तक स्थिरता लेकर आएगा."
उन्होंने कहा कि भारत बांग्लादेश में एक स्थिर, लोकतांत्रिक और लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार देखना चाहता है, ऐसी सरकार जिसे स्पष्ट जनादेश हासिल हो.
वह कहती हैं, "अनिश्चितता का यह दौर बहुत लंबा खिंच गया है. अब सभी चाहते हैं कि एक भरोसेमंद चुनाव हो, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे. और उसके बाद एक ऐसी सरकार बने जिसे जनता का स्पष्ट समर्थन मिला हो."
फिर भी, भारत में बहुत से लोग स्वीकार करते हैं कि चुनाव को लेकर एक किस्म की बेचैनी बनी हुई है.
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ डॉक्टर श्रीपर्णा पाठक कहती हैं, "इसे लेकर बहुत उम्मीद भी है और बहुत चिंता भी क्योंकि पिछले 18-19 साल में ऐसा माहौल हमने देखा ही नहीं है."
"असल में, अवामी लीग के हटने से एक राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ है. क्या जमात इसे भर पाएगी? क्या कोई गठबंधन उभरेगा? किसी को नहीं पता. और फिर पूर्वोत्तर का मसला भी है."
उन्होंने बीबीसी से कहा, "ऐसे में सवाल यह है कि भारत इस माहौल में स्थिरता कैसे बनाए रखेगा, यही वजह है कि इतने सारे प्रश्न उठ रहे हैं और इतनी नज़रें टिकी हुई हैं. आने वाला समय दिलचस्प होने वाला है."
इमेज कैप्शन, रीवा गांगुली दास के अनुसार भारत बांग्लादेश में एक स्थिर, लोकतांत्रिक सरकार देखना चाहता है
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास का मानना है कि इस चुनाव से भारत की सबसे बड़ी उम्मीद यह होगी कि बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता लौटे.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "हम जानते हैं कि 5 अगस्त, 2024 से हमारे रिश्तों को बड़ा झटका लगा है."
"खुद बांग्लादेश भी कई तरह के आंतरिक झटकों और हंगामों के दौर से गुज़र रहा है. वहां अंदरखाने भारी राजनीतिक उथल-पुथल जारी है. उम्मीद है कि यह चुनाव कम से कम कुछ हद तक स्थिरता लेकर आएगा."
उन्होंने कहा कि भारत बांग्लादेश में एक स्थिर, लोकतांत्रिक और लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार देखना चाहता है, ऐसी सरकार जिसे स्पष्ट जनादेश हासिल हो.
वह कहती हैं, "अनिश्चितता का यह दौर बहुत लंबा खिंच गया है. अब सभी चाहते हैं कि एक भरोसेमंद चुनाव हो, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे. और उसके बाद एक ऐसी सरकार बने जिसे जनता का स्पष्ट समर्थन मिला हो."
फिर भी, भारत में बहुत से लोग स्वीकार करते हैं कि चुनाव को लेकर एक किस्म की बेचैनी बनी हुई है.
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ डॉक्टर श्रीपर्णा पाठक कहती हैं, "इसे लेकर बहुत उम्मीद भी है और बहुत चिंता भी क्योंकि पिछले 18-19 साल में ऐसा माहौल हमने देखा ही नहीं है."
"असल में, अवामी लीग के हटने से एक राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ है. क्या जमात इसे भर पाएगी? क्या कोई गठबंधन उभरेगा? किसी को नहीं पता. और फिर पूर्वोत्तर का मसला भी है."
उन्होंने बीबीसी से कहा, "ऐसे में सवाल यह है कि भारत इस माहौल में स्थिरता कैसे बनाए रखेगा, यही वजह है कि इतने सारे प्रश्न उठ रहे हैं और इतनी नज़रें टिकी हुई हैं. आने वाला समय दिलचस्प होने वाला है."