नीतीश की राज्यसभा की राह कितनी मुश्किल: 5वें उम्मीदवार को जिताने का क्या गणित, कहां फंस सकता है एनडीए?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 05 Mar 2026 07:46 PM IST

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से राज्यसभा चुनाव में उतरने के एलान के बाद यह चुनाव काफी दिलचस्प हो गए हैं। बिहार में इस साल पांच सीटों पर होने वाले चुनाव में एनडीए का दावा मजबूत है। दूसरी तरफ महागठबंधन विधानसभा चुनाव में बेहद कम सीटें मिलने की वजह से एक सीट के लिए भी संघर्ष करता दिख रहा है।

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बिहार में राज्यसभा सीटों के लिए मुकाबला तय - फोटो : अमर उजाल

विस्तार

16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। देशभर में राज्यसभा की कुल 37 सीटों पर चुनाव होने हैं। इनके लिए महाराष्ट्र से लेकर असम और तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक की राज्यसभा सीटें हैं। हालांकि, बिहार में हुए एक हालिया घटनाक्रम ने इन चुनावों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। दरअसल, बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संसद के उच्च सदन के चुनाव के लिए नामांकन कर दिया है। 

राज्यसभा चुनाव कैसे होता है?

राज्यसभा में किस राज्य से कितने सांसद होंगे यह उस राज्य की जनसंख्या के हिसाब से तय होता है। राज्यसभा के सदस्य का चुनाव उस राज्य की विधानसभा के चुने हुए विधायक करते हैं, जिस राज्य से वह उम्मीदवार है। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनाव से काफी अलग है, क्योंकि इस सदन के लिए मतदान सीधे जनता नहीं करती, बल्कि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है। राज्यसभा चुनावों के नतीजों के लिए एक फॉर्मूला भी तय किया गया है।
चुनाव नतीजों का ये फॉर्मूला क्या है? 
जिस राज्य की राज्यसभा सीट के लिए चुनाव हो रहे हैं, उस राज्य के विधायक इसमें वोट डालते हैं। इन चुनाव में लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तरह वोट नहीं पड़ते। यहां विधायकों को वरीयता के आधार पर वोट डालना होता है। 
विधायकों को चुनाव आयोग की ओर से एक विशेष पेन दिया जाता है। उसी पेन से उम्मीदवारों के आगे वोटर को नंबर लिखने होते हैं। एक नंबर उसे सबसे पसंदीदा उम्मीदवार के नाम के आगे डालना होता है। ऐसे दूसरी पसंद वाले उम्मीदवार के आगे दो लिखना होता है। इसी तरह विधायक चाहे तो सभी उम्मीदावारों को वरीयता क्रम दे सकता है। अगर आयोग द्वारा दी गई विशेष पेन का इस्तेमाल नहीं होता तो वह वोट अमान्य हो जाता है। इसके बाद विधानसभा के विधायकों की संख्या और राज्यसभा के लिए खाली सीटों के आधार पर जीत के लिए आवश्यक वोट तय होते हैं। जो उम्मीदवार उस आवश्यक संख्या से अधिक वोट पाता है वह विजयी घोषित होता है। 

बिहार कैसे तय करेगा अपने राज्यसभा सांसद?

बिहार में विधायकों की कुल संख्या 243 है। इस बार राज्य की कुल पांच राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हो रहा है। हर एक सदस्य को राज्यसभा पहुंचने के लिए कितने विधायकों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए इसके लिए एक तय फॉर्मूला है। यह फॉर्मूला यह है कि कुल विधायकों की संख्या को जितने राज्यसभा सदस्य चुने जाने हैं, उसमें एक जोड़कर विभाजित किया जाता है। 
इस बार यहां से पांच राज्यसभा सदस्यों का चुनाव होना है। इसमें एक जोड़ने से यह संख्या छह होती है। अब कुल सदस्य 243 हैं तो उसे छह से विभाजित करने पर 40.5 आता है। इसमें एक जोड़ने पर यह संख्या 41.5 हो जाती है। यानी बिहार से राज्यसभा सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को 41 प्रथम वरीयता के वोटों की जरूरत होगी। अगर विजेता का फैसला प्रथम वरीयता के वोटों से नहीं होता तो उसके बाद दूसरी वरीयता के वोट गिने जाते हैं।    

बिहार में किन सांसदों की सीटें हो रहीं खाली?

बिहार से कौन-कौन है राज्यसभा का उम्मीदवार?
भाजपा: नितिन नवीन और शिवेश कुमार
रालोमो: उपेंद्र कुशवाहा
जदयू: रामनाथ ठाकुर, नीतीश कुमार
राजद: अमरेंद्र धारी सिंह

किसकी उम्मीदवारी में कितना दम?

बिहार में मौजूदा समय में भाजपा के पास सबसे ज्यादा 89 सीटें हैं, जबकि 85 सीटों के साथ जदयू दूसरे नंबर पर है। मौजूदा समीकरण के मुताबिक, सत्ताधारी गठबंधन चार सीटें आसानी से जीत सकता है। वहीं, पांचवीं सीट पर एनडीए का दावा महागठबंधन के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहा है।  
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। भाजपा को नितिन नवीन और शिवेश कुमार को राज्यसभा में भेजने के लिए 41-41 प्रथम वरीयता के वोटों की जरूरत होगी। पार्टी के पास 89 सीटें हैं। यानी उसके 82 विधायक ही नितिन नवीन और शिवेश कुमार के लिए वोट कर के उन्हें राज्यसभा भेज सकते हैं। यानी भाजपा के पास सात प्रथम वरीयता के वोट फिर भी बाकी रहेंगे, जिसका इस्तेमाल पार्टी अपने किसी सहयोगी को जिताने के लिए कर सकती है। 
कुछ इसी तरह की स्थिति जदयू के साथ भी है। पार्टी से इस बार हरिवंश नारायण की जगह नीतीश कुमार उम्मीदवार हैं। इसके अलावा कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर भी राज्यसभा के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं। जदयू के पास 85 सीट हैं और वह आसानी से अपने दोनों उम्मीदवारों को राज्यसभा पहुंचा सकती है। यानी उसके पास भी तीन प्रथम वरीयता के वोट बचेंगे। 
यानी स्पष्ट है कि भाजपा और जदयू आसानी से अपने नेताओं को राज्यसभा पहुंचा देंगी। इस लिहाज से नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने में कोई अड़चन नहीं दिखती। 

खाली हो रही पांचवीं सीट पर हो सकता है टकराव

बिहार में राज्यसभा के लिए पांचवीं सीट को लेकर सियासी दलों में भिड़ंत तय है। हालांकि, इसमें भी एनडीए के पास कुछ बढ़त है। दरअसल, राजद और कांग्रेस के साथ अगर लेफ्ट पार्टियों की सीटें मिला भी दी जाएं तो भी विपक्ष 41 प्रथम वरीयता के वोट हासिल नहीं कर सकता। वह यह आंकड़ा सिर्फ एआईएमआईएम और बसपा के समर्थन से ही हासिल हो सकता है। 

दूसरी तरफ एनडीए के पास भाजपा और जदयू के बचे हुए 10 प्रथम वरीयता वोट (7 भाजपा+3 जदयू), लोजपा (रामविलास) के 19 प्रथम वरीयता वोट, हम के पांच, रालोमो के चार विधायक हैं। यानी एनडीए के पास कुल 38 प्रथम वरीयता वोट हैं, जो कि महागठबंधन से ज्यादा हैं। ऐसे में अगर एनडीए कुछ विधायकों को क्रॉस वोटिंग के लिए मना लेती है या एआईएमआईएम, बसपा का समर्थन हासिल कर लेती है तो उसके पास जरूरी मत होंगे। 

चूंकि, राज्यसभा चुनाव में एनडीए के ही सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा भी मैदान में हैं, इसलिए एनडीए उन्हें राज्यसभा भेजकर सदन में संख्याबल को बढ़ाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएगी। दूसरी तरफ महागठबंधन एक बार फिर पूरे विपक्ष को एकजुट कर सत्तासीन गठबंधन को चुनौती देने की कोशिश करेगी।

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