-आचार्य दीनानाथ पाठक
सनातन संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा नहीं हैं. इनके भीतर जीवन, प्रकृति, पर्यावरण और समस्त जीव-जगत के प्रति मनुष्य के दायित्व का संदेश भी निहित है. श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला नागपंचमी का पर्व इसी व्यापक दृष्टि का परिचायक है. नागपंचमी पर नाग देवता की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और कल्याण की कामना की जाती है, लेकिन इस पर्व का वास्तविक संदेश इससे कहीं व्यापक है. यह हमें प्रकृति के उन जीवों के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना भी सिखाता है, जिनका मानव जीवन और पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण योगदान है.
सनातन परंपरा में नागों को विशेष धार्मिक सम्मान प्राप्त है. भगवान शिव के गले में नाग का विराजमान होना और भगवान विष्णु का शेषनाग की शैया पर विराजना इस बात का प्रतीक है कि नाग केवल एक जीव नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना में विशिष्ट स्थान रखने वाले प्रतीक हैं. हमारी धार्मिक कथाओं और लोक परंपराओं में नागों का उल्लेख अनेक रूपों में मिलता है. महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने नागों के विनाश के लिए सर्पसत्र यज्ञ प्रारंभ किया था. उस समय आस्तिक मुनि ने हस्तक्षेप कर नागों की रक्षा की और यह यज्ञ रुकवाया. मान्यता है कि यह घटना श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन हुई थी और इसी स्मृति में नागपंचमी मनाने की परंपरा आगे बढ़ी.
नागपंचमी के अवसर पर श्रद्धालु नाग देवता की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और अपनी परंपरा के अनुसार दूध, अक्षत, पुष्प आदि अर्पित करते हैं. धार्मिक मान्यताओं में नाग पूजा को सर्पभय से मुक्ति और परिवार की रक्षा से जोड़ा गया है. अनेक लोग इस दिन नाग देवता का स्मरण कर जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं. कुछ धार्मिक परंपराओं में नाग पूजा को ज्योतिषीय मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है. हालांकि, इन मान्यताओं के साथ यह समझना भी आवश्यक है कि पूजा की भावना जीव के प्रति करुणा और सम्मान की होनी चाहिए, न कि उसके प्रति किसी प्रकार की हिंसा या यातना की.
नागपंचमी का पर्यावरणीय महत्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है. भारत लंबे समय से कृषि प्रधान देश रहा है और खेतों की पारिस्थितिकी में सांपों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. सांप खेतों में पाए जाने वाले चूहों और कई अन्य छोटे जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में प्राकृतिक भूमिका निभाते हैं. यदि पारिस्थितिकी तंत्र से सांपों की संख्या तेजी से कम हो जाए तो चूहों की संख्या बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर फसलों पर पड़ सकता है. इस दृष्टि से सांप किसान के प्राकृतिक सहयोगी माने जाते हैं.
प्रकृति की खाद्य श्रृंखला में प्रत्येक जीव की अपनी भूमिका होती है. सांप इस श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वे स्वयं कई जीवों का भोजन बनते हैं और दूसरी ओर चूहों जैसे जीवों की आबादी को नियंत्रित करते हैं. इसलिए किसी एक प्रजाति की संख्या में असंतुलन पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है. नागपंचमी की परंपरा को यदि इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पर्व हमें जैव विविधता के महत्व को समझने का अवसर भी देता है.
श्रावण मास वर्षा ऋतु का समय होता है. लगातार बारिश के कारण सांपों के प्राकृतिक बिलों और रहने के स्थानों में पानी भर जाता है. ऐसे में वे सुरक्षित स्थान की तलाश में बाहर निकल सकते हैं और कई बार मानव बस्तियों के आसपास भी दिखाई देते हैं. इस परिस्थिति में सांप को देखकर घबराने या उसे मारने के बजाय प्रशिक्षित वन्यजीव बचाव दल अथवा संबंधित विभाग की सहायता लेना अधिक उचित है. अधिकांश स्थितियों में मनुष्य और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा के लिए दूरी बनाए रखना ही सबसे बेहतर उपाय है.
समय के साथ नागपंचमी की पूजा-पद्धति में भी बदलाव की आवश्यकता महसूस होती है. धार्मिक आस्था के नाम पर जीवित सांपों को पकड़कर उन्हें लंबे समय तक बंद रखना, उनके साथ छेड़छाड़ करना या जबरन दूध पिलाना उचित नहीं है. सांपों की शारीरिक संरचना और प्राकृतिक आहार को देखते हुए मनुष्य द्वारा उन्हें दूध पिलाना उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है. धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए भी किसी जीव को पीड़ा पहुंचाना उस आस्था की मूल भावना के विपरीत है.
इसलिए नागपंचमी पर मिट्टी, धातु या अन्य प्राकृतिक सामग्री से बने नाग देवता के प्रतीक की पूजा करना अधिक उचित और संवेदनशील परंपरा हो सकती है. इससे श्रद्धा भी बनी रहती है और किसी जीव को पकड़कर पूजा करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती. वास्तविक पूजा तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ करुणा और संरक्षण की भावना भी जुड़ी हो.
आज जब पर्यावरणीय असंतुलन, जंगलों का घटता क्षेत्र, प्राकृतिक आवासों का विनाश और वन्यजीवों के सामने बढ़ते खतरे चिंता का विषय हैं, तब नागपंचमी जैसे पर्वों के संदेश को नए संदर्भ में समझने की जरूरत है. धार्मिक परंपराएं यदि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ जाएं तो उनका सामाजिक प्रभाव और व्यापक हो सकता है. बच्चों और युवाओं को यह बताया जाना चाहिए कि नागों और अन्य जीवों का संरक्षण केवल वन विभाग या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है.
नागपंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है. जिस धरती पर हम रहते हैं, वहां छोटे से छोटे जीव की भी अपनी उपयोगिता है. किसी जीव का हमारे लिए भय का कारण होना उसके अस्तित्व को समाप्त करने का आधार नहीं हो सकता. हमें भय और अंधविश्वास के स्थान पर जानकारी, सावधानी और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करनी होगी.
इस नागपंचमी पर यदि हम नाग देवता की पूजा के साथ यह संकल्प भी लें कि किसी सांप या अन्य वन्य जीव को अनावश्यक रूप से नुकसान नहीं पहुंचाएंगे, उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने में सहयोग करेंगे और बच्चों को जैव विविधता के महत्व के बारे में बताएंगे, तो पर्व की आध्यात्मिक भावना और अधिक सार्थक होगी. सनातन संस्कृति का मूल संदेश प्रकृति के प्रति सम्मान, जीव मात्र के प्रति करुणा और समस्त सृष्टि के साथ संतुलित जीवन का है. नागपंचमी इसी संदेश को आत्मसात करने का अवसर है.
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