विधायक की सदस्यता रद्द होने से बदल सकता है राज्यसभा चुनाव का गणित
भोपाल। प्रदेश की सियासी फिजाओं में इन दिनों एक अदालती फैसले की गूंज ने कांग्रेस खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है। मुरैना जिले की विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता को उच्च न्यायालय द्वारा शून्य घोषित किए जाने के बाद से प्रदेश की राजनीति में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। यह मामला महज एक विधायक की विदाई तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश कांग्रेस संगठन की कानूनी और रणनीतिक कमजोरियों पर एक तीखा प्रहार बनकर उभरा है।
न्यायालयीन फैसले के बाद कांग्रेस के भीतर ही मंथन का दौर शुरू हो गया है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता दबी जुबान से इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि अदालत में पैरवी के दौरान अपेक्षित गंभीरता का अभाव था। अनुभवी विधि विशेषज्ञों की अनुपलब्धता और संगठनात्मक समन्वय में कमी ने पार्टी को एक निर्वाचित विधायक के नुकसान के रूप में भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते कानूनी बिन्दुओं पर ठोस तैयारी की गई होती, तो शायद परिणाम भिन्न हो सकते थे।
राज्यसभा की सीट पर मंडराता संख्यात्मक संकट
अप्रैल माह में होने वाले राज्यसभा चुनाव के मद्देनजर यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। प्रदेश में रिक्त होने वाली तीन सीटों में से गणितीय रूप से एक सीट कांग्रेस के खाते में सुरक्षित मानी जा रही थी, लेकिन अब स्थितियां बदलती दिख रही हैं। वर्तमान में कांग्रेस के पास 63 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए न्यूनतम 58 मतों की आवश्यकता है। पार्टी के पास अब केवल 5 मतों का बेहद सीमित मार्जिन बचा है। यह 5 मतों का अंतर अत्यंत संवेदनशील है। यदि क्रॉस वोटिंग की स्थिति बनती है या किन्हीं तकनीकी कारणों से मत अमान्य हो जाते हैं, तो कांग्रेस की एकमात्र सुरक्षित सीट भी खतरे में पड़ सकती है। भाजपा की सक्रियता और तीसरी सीट जीतने की महत्वाकांक्षा ने इस मुकाबले को और अधिक रोमांचक और कठिन बना दिया है।
गुटबाजी और नेतृत्व की चुनौती
कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के दावों के बीच, विधानसभा सत्रों में अक्सर विधायकों का गुटों में बंटा होना पार्टी के लिए चिंता का विषय रहा है। स्पष्ट है कि यदि पार्टी ने अपने विधायकों को एकजुट रखने और प्रभावी राजनीतिक प्रबंधन में शिथिलता बरती, तो न केवल आगामी राज्यसभा चुनाव, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी के प्रभाव पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि शीर्ष नेतृत्व इस कानूनी और राजनीतिक संकट से निपटने के लिए क्या डैमेज कंट्रोल रणनीति अपनाता है।