Iran War: 'पश्चिम एशिया युद्ध से भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर भारी दबाव'; जानें पीएचडी चेंबर की क्या है चिंता

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Wed, 11 Mar 2026 08:45 PM IST

क्या पश्चिम एशिया संकट का भारत की ऊर्जा सुरक्षा और राजकोषीय गणित पर गहरा असर पड़ा है। पीएचडी चेंबर ऑफ कॉमर्स ने इस बारे में क्या कहा है, आइए जानते हैं विस्तार से।

विस्तार

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला को बुरी तरह बाधित कर दिया है, जिसका सीधा असर भारत के कई प्रमुख सेक्टर्स, खासकर गैस पर निर्भर उद्योगों और बंदरगाह आधारित व्यापार पर पड़ रहा है।  पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) के सीईओ और महासचिव रंजीत मेहता ने इस संकट पर चिंता जताते हुए साफ किया है कि यह युद्ध भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। मेहता के मुताबिक, 'बंदरगाहों पर अफरा-तफरी का माहौल है और गैस सप्लाई पर निर्भर कई व्यवसायों को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है'।

नए बाजारों से गैस की खरीद, लेकिन बढ़ेगा 'आयात बिल'

पश्चिम एशिया के संकट से पैदा हुई इस अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने सक्रिय कदम उठाते हुए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और मोजाम्बिक जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से प्राकृतिक गैस की खरीद शुरू कर दी है। मेहता ने अनुमान जताया कि नए विकल्पों से आपूर्ति शुरू होने और स्थिति को स्थिर होने में लगभग दो से तीन सप्ताह का समय लग सकता है। उन्होंने बताया कि अमेरिका या अन्य स्रोतों से आयातित गैस की प्रति एमएमबीटीयू (मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट) कीमत मध्य पूर्व की तुलना में निश्चित रूप से अधिक होगी। इसके परिणामस्वरूप भारत के इंपोर्ट बिल (आयात बिल) में सीधा इजाफा होगा, लेकिन देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

उत्पादन और लॉजिस्टिक्स की लागत में उछाल

इस भू-राजनीतिक संकट के कारण वैश्विक कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के बाजार में भारी उछाल आया है। मेहता ने बताया कि जो कीमतें पहले $60-$65 के स्तर पर थीं, वे अब 90 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर चुकी हैं और एक समय तो यह 117 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं। उन्होंने चेतावनी दी कि क्रूड का 90 डॉलर से ऊपर जाना भारत ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण सीधे तौर पर उत्पादन, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ जाती है। इसका असर फार्मास्युटिकल व्यापार सहित व्यापक आयात-निर्यात गतिविधियों पर पड़ रहा है, जिससे शिपिंग महंगी हो रही है और अंततः अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बन रहा है।

खरीफ सीजन से पहले उर्वरक सेक्टर की चिंताएं

गैस आपूर्ति में हो रही इस रुकावट ने उर्वरक उद्योग के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है, क्योंकि प्राकृतिक गैस इस सेक्टर का प्रमुख कच्चा माल है। मेहता ने बताया कि आगामी खरीफ सीजन को देखते हुए फर्टिलाइजर के उत्पादन और उपलब्धता पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है, हालांकि उन्हें भरोसा है कि सरकार इस स्थिति को सफलतापूर्वक प्रबंधित कर लेगी। 

नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख

वर्तमान की इन अल्पकालिक चुनौतियों के बीच, यह संकट आयातित जीवाश्म ईंधन  पर भारत की निर्भरता कम करने की आवश्यकता को मजबूती से रेखांकित करता है। मेहता ने जोर देकर कहा कि दीर्घकालिक तौर पर पूरी तरह से ऊर्जा सुरक्षित बनने के लिए भारत को रिन्यूएबल (अक्षय) ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ना होगा। सरकार ने पहले ही 2030 तक लगभग 500 गीगावाट रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता हासिल करने का रोडमैप तैयार कर लिया है, जो भविष्य में ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण के साथ मिलकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाने में मदद करेगा।


Leave Comments

Top