सोशल माध्यम कंपनियों पर ऐतिहासिक फैसला, बच्चों को लत लगाने के आरोप में मेटा और गूगल दोषी करार

लॉस एंजिलिस. Meta Platforms और Google के खिलाफ एक ऐतिहासिक फैसले में जूरी ने दोनों कंपनियों को उनके मंचों को इस तरह तैयार करने का दोषी ठहराया है, जिससे कम उम्र के उपयोगकर्ताओं में लत लगती है. यह फैसला सामाजिक माध्यम उद्योग के लिए एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, जो भविष्य में हजारों ऐसे मामलों की दिशा तय कर सकता है.

यह मामला Los Angeles की एक अदालत में चला, जहां कई सप्ताह तक चली सुनवाई और लंबी विचार-विमर्श प्रक्रिया के बाद जूरी ने यह निर्णय सुनाया. अदालत ने पहली बार यह माना कि सामाजिक माध्यम के मंचों को ऐसे उत्पाद के रूप में देखा जा सकता है, जिन्हें इस तरह बनाया गया है कि वे बच्चों और किशोरों को अधिक समय तक बांधे रखें.

इस मामले में एक 20 वर्षीय युवती ने शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उसने आरोप लगाया कि इन मंचों की बनावट और कार्यप्रणाली ने उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाला. युवती के अनुसार, लगातार आने वाले सूचनाएं, स्वतः चलने वाली सामग्री और सुझाव देने वाली प्रणाली के कारण वह इन मंचों से अलग नहीं हो पाती थी.

उसने बताया कि उसने कम उम्र में ही इन माध्यमों का उपयोग शुरू कर दिया था और धीरे-धीरे यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया. इसके चलते उसे आत्मछवि से जुड़ी समस्याएं, अवसाद और आत्मघाती विचारों का सामना करना पड़ा. अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों में यह भी दिखाया गया कि कंपनियां बच्चों और किशोरों को अपने मंचों पर बनाए रखने के लिए विशेष रणनीतियां अपनाती थीं.

जूरी ने इस मामले में कुल 60 लाख रुपये के समकक्ष क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश दिया है. इसमें से 70 प्रतिशत राशि मेटा को और 30 प्रतिशत गूगल को देने का निर्देश दिया गया है. इसके अलावा दंडात्मक क्षतिपूर्ति भी निर्धारित की गई है, जिसमें कंपनियों के आचरण को गंभीर मानते हुए अतिरिक्त राशि देने को कहा गया है.

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कंपनियों के आंतरिक दस्तावेजों में यह स्वीकार किया गया था कि कम उम्र के उपयोगकर्ताओं को आकर्षित करना और उन्हें लंबे समय तक जोड़े रखना उनकी प्राथमिकता का हिस्सा था. इन दस्तावेजों ने मामले को और गंभीर बना दिया.

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसे एक परीक्षण मामले के रूप में देखा जा रहा था. हजारों परिवारों ने इसी तरह के आरोप लगाते हुए अलग-अलग मुकदमे दायर किए हैं. ऐसे में इस फैसले का असर आने वाले समय में अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है.

हालांकि दोनों कंपनियों ने इस फैसले से असहमति जताते हुए इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है. उनका कहना है कि वे अपने मंचों को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं और इस फैसले का कानूनी रूप से विरोध करेंगे.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय सामाजिक माध्यम कंपनियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. इससे यह संकेत मिलता है कि तकनीकी कंपनियों को अपने उत्पादों के सामाजिक और मानसिक प्रभावों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि डिजिटल माध्यमों का अत्यधिक उपयोग विशेषकर बच्चों और किशोरों के लिए कितना खतरनाक हो सकता है. आने वाले समय में इस विषय पर और सख्त नियम बनाए जाने की संभावना जताई जा रही है.


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