कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन के बीच गहराईं संगठनात्मक चुनौतियां

 युवा नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर उठने लगे सवाल
भोपाल। विधानसभा चुनाव 2023 के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने सूबे में पीढ़ी परिवर्तन का जो बड़ा प्रयोग किया था, वह अब संगठन के लिए ही सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। बुजुर्ग चेहरों को हाशिए पर धकेलकर जीतू पटवारी और उमंग सिंघार जैसे युवा चेहरों को कमान सौंपने के पीछे मंशा पार्टी को हाई-टेक और आक्रामक बनाने की थी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। युवा नेतृत्व के आते ही मध्यप्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक बिखराव और गहरा गया है,। अब खुद पार्टी के भीतर से ही नए कप्तानों की राजनीतिक रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं।
हाल ही में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होना किसी एक चुनाव की विफलता नहीं, बल्कि युवा नेतृत्व के लचर रणनीतिक प्रबंधन का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के शीर्ष प्रादेशिक रणनीतिकार एक राज्यसभा उम्मीदवार के दस्तावेजों की बुनियादी जांच तक सही ढंग से क्यों नहीं करवा पाए? इससे पहले इंदौर में अक्षय बम का ऐन वक्त पर दलबदल करना हो, विधायक मुकेश मल्होत्रा प्रकरण हो, या फिर दतिया में भाजपा के दिग्गज नरोत्तम मिश्रा को पटखनी देने वाले पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को अघोषित रूप से हाशिए पर धकेल देना, ये तमाम घटनाएं साबित करती हैं कि युवा कमान के पास संकट प्रबंधन की भारी कमी है। इन झटकों को अब कांग्रेसी नेता महज तकनीकी चूक मानने को तैयार नहीं हैं, बल्कि इसे सीधे तौर पर प्रदेश नेतृत्व की राजनैतिक अपरिपक्वता से जोड़कर देखा जा रहा है।
निर्मला सप्रे मामले में लाचारी
संगठन में सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व की निर्णय लेने की क्षमता को लेकर खड़ी हुई है। बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे लंबे समय से खुलकर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं और लगातार भाजपा के मंचों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। दलबदल कानून के तहत प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को अब तक उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द कराने के लिए आक्रामक और सख्त कदम उठाने चाहिए थे, परंतु, इस संवेदनशील मामले में नेतृत्व की ढुलमुल नीति और टालमटोल वाले रवैये ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया है।
अपनों का ही अविश्वास
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की कार्यशैली और सांगठनिक अक्षमता पर उंगली उठाने वाले अधिकांश नेता और कार्यकर्ता उसी मालवा अंचल से ताल्लुक रखते हैं, जो इन दोनों नेताओं का खुद का गृह क्षेत्र माना जाता है। अपने ही गढ़ में घिरे युवा नेतृत्व के खिलाफ अब असंतोष की चिंगारी दिल्ली तक पहुंच चुकी है।

Leave Comments

Top