शिवसेना में फिर बगावत की आहट, छह सांसदों की गैरमौजूदगी से बढ़ी उद्धव की मुश्किलें

मुंबई. महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल देखने को मिल रहा है. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के भीतर बढ़ती नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है. पार्टी के छह लोकसभा सांसदों के लगातार महत्वपूर्ण बैठकों और स्थापना दिवस समारोह से दूरी बनाए रखने के बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रही है. घटनाक्रम ने पार्टी में संभावित टूट की अटकलों को और तेज कर दिया है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नाराज सांसद अलग गुट बनाकर मुख्यमंत्री रह चुके एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं.

शुक्रवार को मुंबई के माटुंगा स्थित शण्मुखानंद सभागार में शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन किया गया. यह कार्यक्रम पार्टी के लिए शक्ति प्रदर्शन और संगठनात्मक एकजुटता दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा था. लेकिन इस कार्यक्रम में कथित तौर पर बागी माने जा रहे छह सांसदों की अनुपस्थिति ने पूरे आयोजन की राजनीतिक दिशा बदल दी. उनकी गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को और गहरा कर दिया.

गैरहाजिर रहने वाले सांसदों में संजय दीना पाटिल, नागेश पाटिल आष्टीकर, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, संजय देशमुख और संजय जाधव शामिल हैं. ये सभी सांसद एक दिन पहले नई दिल्ली में आयोजित संसदीय दल की बैठक में भी शामिल नहीं हुए थे. पार्टी नेतृत्व की ओर से व्हिप जारी किए जाने के बावजूद उनका बैठक में नहीं पहुंचना राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना गया था. अब स्थापना दिवस समारोह से भी दूरी बनाने के बाद यह स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि पार्टी के भीतर मतभेद केवल नाराजगी तक सीमित नहीं रह गए हैं.

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार ये सांसद अपने भविष्य को लेकर अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. चर्चा है कि वे अलग संसदीय समूह बनाकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जाने का निर्णय ले सकते हैं. यदि ऐसा होता है तो यह दो वर्षों के भीतर उद्धव ठाकरे के लिए दूसरा बड़ा राजनीतिक झटका होगा. वर्ष 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत ने शिवसेना को दो हिस्सों में बांट दिया था और उसके बाद से पार्टी लगातार संगठनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है.

हालांकि अभी तक किसी भी सांसद की ओर से औपचारिक घोषणा नहीं की गई है. कुछ नेताओं का कहना है कि अगले दो दिनों में राजनीतिक स्थिति को लेकर बड़ा फैसला सामने आ सकता है. ऐसे में महाराष्ट्र की राजनीति की निगाहें अब बागी सांसदों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं.

इस बीच स्थापना दिवस समारोह में उद्धव ठाकरे ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए पार्टी में कांग्रेस के साथ विलय की चल रही अटकलों पर खुलकर जवाब दिया. उन्होंने कहा कि शिवसेना ने तीन दशक तक भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया था, लेकिन कभी उसमें विलय नहीं किया. ऐसे में कांग्रेस में विलय का सवाल ही नहीं उठता. उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट किया कि शिवसेना की स्थापना मराठी मानुष के अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हुई थी और पार्टी अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ आगे बढ़ती रहेगी.

उन्होंने कहा कि कुछ लोग जानबूझकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी की विचारधारा और संगठनात्मक पहचान को कमजोर करने के लिए ऐसी अफवाहों को हवा दी जा रही है. उद्धव ठाकरे का यह बयान उस समय आया जब शिंदे गुट के सांसद नरेश म्हस्के ने दावा किया था कि कई सांसदों को आशंका है कि भविष्य में उद्धव गुट कांग्रेस में विलय कर सकता है. उन्होंने शिवसेना नेता संजय राउत पर कांग्रेस के प्रभाव में काम करने का आरोप भी लगाया था.

स्थापना दिवस समारोह के दौरान उद्धव ठाकरे ने भावुक अंदाज में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि यदि उनके नेतृत्व पर भरोसा नहीं है तो वह पद छोड़ने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि वह चुनौतियों से भागने वाले व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन यदि कार्यकर्ताओं और नेताओं का विश्वास उन पर नहीं रहा तो वह नेतृत्व छोड़ने में भी संकोच नहीं करेंगे. उनके इस बयान को पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

उद्धव ठाकरे ने बागी सांसदों के संसदीय क्षेत्रों के मतदाताओं से भी माफी मांगते हुए कहा कि जनता का विश्वास लोकतंत्र से उठता जा रहा है. उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यदि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को इस प्रकार तोड़ने और दल बदल को बढ़ावा देने की राजनीति जारी रही तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो सकती है. उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों द्वारा शिवसेना को खत्म करने की लगातार कोशिश की जा रही है.

दूसरी ओर, विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने भी बागी सांसदों पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने गैरहाजिर सांसदों को विश्वासघाती, बेईमान और धोखेबाज तक करार दिया. राउत के बयान के बाद दोनों पक्षों के बीच टकराव और तेज हो गया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी पार्टी के भीतर समझौते की संभावनाओं को और कमजोर कर सकती है.

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र खुफिया विभाग ने बागी सांसदों को वाई-प्लस श्रेणी के बराबर सुरक्षा उपलब्ध कराई है. इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक तनाव केवल संगठनात्मक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी इसे गंभीरता से लिया जा रहा है.

महाराष्ट्र की राजनीति में तेजी से बदलते इस घटनाक्रम ने आने वाले दिनों को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है. यदि छह सांसदों का अलग होने का फैसला अंतिम रूप लेता है तो यह उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति को और कमजोर कर सकता है. वहीं यदि पार्टी नेतृत्व असंतुष्ट सांसदों को मनाने में सफल रहता है तो यह संकट टल भी सकता है. फिलहाल इतना तय है कि शिवसेना के भीतर चल रही यह लड़ाई महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा और दशा दोनों पर गहरा प्रभाव डालने वाली है.


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