41 साल बाद अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय बने ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अपनी यात्रा को भारत की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ दिया। वे अंतरिक्ष में अपने साथ सिर्फ 20 ग्राम का एक छोटा डिब्बा लेकर गए, जिसमें भारत की हजारों साल पुरानी वस्त्र परंपरा समाई थी। ‘धरोहर डेक’ के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया कि जब भारत विज्ञान में नई ऊंचाइयों को छू रहा है, तब उसकी जड़ें और कारीगरी भी भविष्य की यात्रा का हिस्सा हैं।इस बात को लेकर ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने रविवार को बताया कि जब वे अंतरिक्ष गए थे, तो अपने साथ भारत की समृद्ध वस्त्र परंपरा को भी ले गए थे। उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा के दौरान एक छोटा-सा डिब्बा साथ रखा, जिसका वजन सिर्फ 20 ग्राम था, लेकिन उसमें भारत की हजारों साल पुरानी कपड़ा विरासत समाई हुई थी।
शुभांशु शुक्ला ने बताया डिब्बे की खासियत
शुक्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर डिब्बे और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर जोर दिया। उन्होंने लिखा कि यह डिब्बा भले ही हल्का था, लेकिन इसमें भारत के ज्ञान, मेहनत, कला और मानव कौशल की गहरी कहानी छिपी थी। उन्होंने कहा कि यह भारत की पहचान और भविष्य का एक शांत लेकिन मजबूत संदेश था, जो पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था।
समझिए क्या था ‘धरोहर डेक’?
शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वे अपने साथ ‘धरोहर डेक’ नाम का एक खास संग्रह लेकर गए थे। इसमें स्पर्श के जरिए महसूस की जा सकने वाली कार्ड्स थीं, जो भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं। हर कार्ड में भारत की मशहूर वस्त्र परंपरा का एक हिस्सा शामिल था, जिसे छूकर इतिहास, यादें और कारीगरी को महसूस किया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि यह डेक पीढ़ियों को जोड़ने के लिए तैयार किया गया है और यह दिखाता है कि कैसे भारत की पारंपरिक कला और आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
इस दौरान शुक्ला ने यह भी कहा कि ‘धरोहर डेक’ भारतीय कारीगरों की प्रतिभा को सम्मान देने का प्रयास है। उन्होंने याद दिलाया कि औद्योगिक क्रांति से बहुत पहले भारत दुनिया का कपड़ा केंद्र था। यहां इतना बारीक सूती कपड़ा बनता था जिसे 'हवा में बुना हुआ' कहा जाता था। भारत का रेशम सिल्क रूट से दुनिया भर में जाता था और प्राकृतिक रंग इतने टिकाऊ थे कि आज भी आधुनिक रसायनों से बेहतर माने जाते हैं। ब्लॉक प्रिंटिंग, इकत, जामदानी और कलमकारी जैसी तकनीकों को उन्होंने सिर्फ शिल्प नहीं, बल्कि विज्ञान, गणित, खगोल, रसायन और प्रकृति का ज्ञान बताया, जो धागों में छिपा हुआ है।
विरासत को भविष्य तक ले जाने का संदेश
शुभांशु शुक्ला ने कहा कि आज़ादी से पहले से लेकर आज तक और आगे भी हस्तशिल्प भारत की आर्थिक मजबूती, सांस्कृतिक पहचान और टिकाऊ विकास का अहम हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कहा कि धरोहर डेक को अंतरिक्ष में ले जाकर यह संदेश दिया गया कि हमारी विरासत भी भविष्य का हिस्सा है।
उनके अनुसार कि जब भारत सितारों की ओर बढ़ रहा है, तब यह जरूरी है कि हम अपनी जड़ों को साथ लेकर चलें। पारंपरिक शिल्प को आगे बढ़ाना सिर्फ यादों से जुड़ना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए सोचने जैसा है। शुक्ला ने यह भी बताया कि वे अपने साथ ऐसे कला-वस्तुएं लेकर गए थे, जिन्हें नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (NID) के छात्रों ने बनाया था। ये वस्तुएं भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की शिल्प परंपराओं को दर्शाती हैं।
41 साल बाद अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय
गौरतलब है कि शुभांशु शुक्ला नासा के एक्सिओम एक्सिओम स्पेस मिशन का हिस्सा थे। यह मिशन 25 जून को अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित केनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च हुआ था। वे 15 जुलाई को कैलिफोर्निया के तट के पास समुद्र में सुरक्षित लौटे। इसके साथ ही वे 41 साल बाद अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय बने। यह यात्रा न सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि थी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को अंतरिक्ष तक पहुंचाने की एक ऐतिहासिक पहल भी बनी।