कलम, कला और कर्म का त्रिवेणी संगम, प्रदेश की तीन विभूतियों को पद्मश्री

साहित्य के शिखर कैलाश चंद्र पंत, सागर के मार्शल आर्ट गुरु भगवानदास रैकवार और समाजसेवी मोहन नागर का हुआ चयन
भोपाल। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ’पद्म पुरस्कारों’ की घोषणा कर दी है। इस वर्ष मध्य प्रदेश की झोली में तीन पद्मश्री सम्मान आए हैं। प्रदेश का नाम रोशन करने वाली इन हस्तियों में भोपाल के प्रख्यात लेखक व वरिष्ठ पत्रकार कैलाश चंद्र पंत, सागर के बुंदेली कला को लुप्त होने से बचाने वाले कलाकार भगवानदास रैकवार और मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर शामिल हैं। नागर को पर्यावरण के क्षेत्र में किए कार्य के लिए यह सम्मान मिला है।
विशेष रूप से, साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में कैलाश चंद्र पंत के चयन को समूचे हिंदी जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। उन्हें ’अनसंग हीरोज’ (अनाम नायक) श्रेणी में यह सम्मान दिया गया है। 89 वर्षीय कैलाश चंद्र पंत का जीवन हिंदी भाषा और राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहा है। 26 अप्रैल 1936 को महू (इंदौर) में जन्मे पंत का पैतृक नाता उत्तराखंड से है। उन्होंने हिंदी के प्रति अपने अनुराग के कारण सरकारी नौकरी का मोह त्याग दिया और स्वतंत्र पत्रकारिता की राह चुनी। उन्होंने 22 वर्षों तक साप्ताहिक ’जनधर्म’ का प्रकाशन किया। उनका स्थायी कॉलम ’’’चलती चक्की’’’ देश भर के साहित्यकारों और पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय था। भोपाल में ’हिंदी भवन’ और ’किसान भवन’ को एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने में उनकी निर्णायक भूमिका रही है। उन्होंने महू में ’स्वाध्याय विद्यापीठ’ की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में भी अलख जगाई। उनके द्वारा रचित ’कौन किसका आदमी’ और ’धुंध के आर-पार’ जैसी कृतियाँ साहित्य जगत की अनमोल धरोहर मानी जाती हैं। पंत को साहित्य भूषण, निराला साहित्य सम्मान, संस्कृति गौरव और बृजलाल द्विवेदी सम्मान से भी नवाजा गया है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में हिंदी का वैश्विक प्रचार में उनकी अह्म भूमिका रही है।  वर्ष 1995 में भोपाल में नागरिक अभिनंदन किया गया और ’मालवांचल में कूर्मांचल’ ग्रंथ का संपादन।
पारंपरिक कलाओं को लुप्त होने से बचाया
बुंदेली लोक कला और पारंपरिक युद्ध कौशल के संरक्षण में अपना संपूर्ण जीवन होम करने वाले भगवानदास रैकवार को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया है। भारत सरकार ने उन्हें ’गुमनाम नायकों’ की श्रेणी में चुना है। यह उन व्यक्तित्वों का समूह है जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार की आकांक्षा के समाज और संस्कृति की निस्वार्थ सेवा की। 2 जनवरी 1944 को सागर की पावन धरा पर स्वर्गीय गोरेलाल रैकवार के आंगन में जन्मे भगवानदास  बुंदेलखंड की उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं, जहाँ शौर्य और कला का अद्भुत संगम मिलता है। रैकवार ने न केवल बुंदेली माटी की अखाड़ा संस्कृति और पारंपरिक युद्ध कलाओं को लुप्त होने से बचाया, बल्कि उन्होंने प्राचीन शस्त्रों के संचालन की कला को जीवित रखा, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और बुंदेली लोक नृत्यों के मूल स्वरूप को संरक्षित किया।
जल और पर्यावरण के अघोषित दूत मोहन नागर
जमीनी स्तर पर समर्पित पर्यावरण योद्धा मोहन नागर को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ’पद्मश्री’ सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा हुई है। जल संरक्षण और पर्यावरण चेतना के प्रति उनके दशकों के अथक परिश्रम को केंद्र सरकार ने सर्वोच्च मान्यता दी है, जिससे संपूर्ण प्रदेश गौरवान्वित है। 23 फरवरी 1968 को जन्मे मोहन नागर (पुत्र स्व. भवरलाल नागर एवं स्व. गुलाबदेवी नागर) ने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की शिक्षा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से प्राप्त की। हालाँकि, उनका मन सत्ता की राजनीति के बजाय प्रकृति की सेवा में अधिक रमा। उन्होंने बैतूल जिले की सोना घाटी में वर्षा जल संचयन और नवीन जल संरचनाओं के निर्माण के माध्यम से एक मृतप्राय प्राकृतिक जल चक्र को पुनर्जीवित कर दिखाया। नागर वर्तमान में मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष है। मध्यप्रदेश स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य और नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के प्रबंधन मंडल में भी है।
 


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