कैसे देश के पहले जेन Z आंदोलन ने मनवाई अपनी मांग: इंस्टाग्राम से सड़क तक, 50 दिन में बदल गया राजनीतिक समीकरण

Reported by: हेमंत राजौराEdited by: वरुण शैलेश|नवभारत टाइम्स25 Jul 2026, 10:49 

Gen Z Protest at Jantar Mantar: जंतर मंतर आंदोलन केवल अपनी प्रमुख मांग मनवाने के कारण नहीं, बल्कि अपने तरीके की वजह से भी अलग रहा। विश्लेषक इसे देश का पहला बड़ा जेन Z आंदोलन मान रहे हैं, जिसकी ताकत पारंपरिक संगठन नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, वॉलेंटियर नेटवर्क और विकेंद्रीकृत नेतृत्व बना।

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जेन जी ने नया इतिहास लिख दिया।

नई दिल्लीः करीब 50 दिन पहले 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ एक छोटा छात्र प्रदर्शन शनिवार को उस मुकाम पर पहुंचा, जहां केंद्र सरकार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा। यह आंदोलन केवल अपनी प्रमुख मांग मनवाने के कारण नहीं, बल्कि अपने तरीके की वजह से भी अलग रहा। राजनीतिक विश्लेषक इसे देश का पहला बड़ा जेन Z आंदोलन मान रहे हैं, जिसकी ताकत पारंपरिक संगठन नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, वॉलेंटियर नेटवर्क और विकेंद्रीकृत नेतृत्व बना

इंस्टाग्राम रील, लाइव स्ट्रीम, पोस्ट से बदली आंदोलन की तस्वीर

6 जून को नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू हुआ। शुरुआती दिनों में यहां सीमित संख्या में छात्र पहुंचे। किसी बड़े छात्र संगठन या राजनीतिक दल की मौजूदगी नहीं थी। लेकिन इंस्टाग्राम पर लगातार रील, लाइव स्ट्रीम, पोस्ट और छोटे वीडियो के जरिए आंदोलन की हर गतिविधि देशभर के युवाओं तक पहुंचती रही। यही डिजिटल नेटवर्क धीरे-धीरे इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

दिल्ली से दूसरे शहरों में फैला जेन जी आंदोलन

कुछ ही दिनों में दिल्ली से बाहर पटना, प्रयागराज, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, दरभंगा और अन्य शहरों में भी समर्थन प्रदर्शन शुरू हो गए। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों के छात्र स्वत: इस अभियान से जुड़ते चले गए। सोशल मीडिया ने पहली बार आंदोलन को बिना किसी केंद्रीय संगठनात्मक ढांचे के राष्ट्रीय स्वरूप देने का काम किया।

सरकार की बंदिशों से भी आंदोलन नहीं हुआ धीमा

आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इसका वॉलेंटियर मॉडल रहा। आंदोलन के दौरान जब प्रशासनिक पाबंदियां बढ़ीं, मेट्रो स्टेशनों पर रोक लगी और इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हुईं तब भी प्रदर्शन कमजोर नहीं पड़ा। इसके उलट दिल्ली-एनसीआर के परिवार घर से भोजन बनाकर धरना स्थल पहुंचाने लगे। कई लोगों ने ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप के जरिए प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और पानी भेजा। डॉक्टरों ने मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं दीं, वकीलों ने कानूनी सहायता उपलब्ध कराई और स्वयंसेवकों ने सफाई, मेडिकल सहायता, महिलाओं की सुरक्षा, मीडिया समन्वय और भीड़ प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली। बड़ी भीड़ के बावजूद धरना स्थल पर अनुशासन बनाए रखना आंदोलन की प्रमुख पहचान बन गया।
 
 
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धीरे धीरे जमीन पर मजबूत होता गया प्रोटेस्ट

आंदोलन की टाइमलाइन भी बताती है कि यह चरणबद्ध तरीके से मजबूत हुआ। जून के अंत में सोनम वांगचुक के अनशन से इसे व्यापक राष्ट्रीय समर्थन मिला। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई और बल प्रयोग की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं। इसके बाद देशभर में समर्थन प्रदर्शन तेज हो गए और सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता गया।

जेन जी प्रदर्शन ने राजनीतिक दलों की भूमिका भी बदल दी

इस आंदोलन ने राजनीतिक दलों की भूमिका भी बदल दी। शुरुआत में यह पूरी तरह छात्र-नेतृत्व वाला अभियान था। लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी और आंदोलन राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना, कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेता जंतर-मंतर पहुंचे और समर्थन दिया। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री के घर के बाहर प्रदर्शन कर प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन किया। हालांकि आंदोलन की रणनीति और नेतृत्व सीजेपी के पास ही रहा। यानी इस बार राजनीतिक दलों ने आंदोलन की अगुवाई नहीं की, बल्कि पहले से खड़े आंदोलन के साथ खुद को ज

प्रधान के इस्तीफे पर डटे रहे आंदोलनकारी

सरकार ने पहले परीक्षा सुधार, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी में बदलाव और अन्य सुधारात्मक कदमों की घोषणा की। कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर कायम रहे। आखिरकार शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने और आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने पर भी सकारात्मक रुख दिखाया, जिसके बाद सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी।

भारतीय छात्र राजनीति के लिए एक नया संकेत

यह आंदोलन भारतीय छात्र राजनीति के लिए एक नया संकेत भी छोड़ गया। इसने दिखाया कि जेन Z केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय पीढ़ी नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संगठित होकर सड़क पर शांतिपूर्ण, अनुशासित और लंबे समय तक चलने वाला जनदबाव भी बना सकती है। इंस्टाग्राम से शुरू हुई यह मुहिम आखिरकार सरकार के राजनीतिक फैसले को प्रभावित करने तक पहुंच ग

टाइमलाइन: कैसे बढ़ा जेन Z आंदोलन

16 मई 2026 : सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की शुरुआत हुई। बाद में इंस्टाग्राम के जरिए नीट और परीक्षा सुधार का अभियान शुरू।

6 जून : दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहला धरना शुरू। शुरुआती दिनों में कुछ सौ छात्र और युवा ही जुटे।

10-25 जून : इंस्टाग्राम रील, लाइव और पोस्ट के जरिए आंदोलन तेजी से फैलने लगा। दिल्ली के अलावा अन्य शहरों में भी समर्थन प्रदर्शन शुरू हुए।

28 जून : सोनम वांगचुक ने आंदोलन के समर्थन में अनशन शुरू किया। इसके बाद आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा मिजुलाई का पहला पखवाड़ा : जंतर-मंतर पर भीड़ लगातार बढ़ी। वोलंटियर ने भोजन, पानी, मेडिकल सहायता, सफाई और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था संभाली। ऑनलाइन फूड डिलीवरी और घर से भोजन पहुंचाने का सिलसिला शुरू हुआ।

20 जुलाई : सीजेपी के संसद चलो मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई, बैरिकेडिंग और बल प्रयोग की घटनाएं हुईं। तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिससे आंदोलन को देशभर में और समर्थन मिला।

21- 24 जुलाई : केंद्र सरकार और सीजेपी के बीच कई दौर की वार्ता हुई। सरकार ने परीक्षा सुधार, एनटीए में बदलाव और अन्य मांगों पर सकारात्मक संकेत दिए, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर गतिरोध बना रहा।

25 जुलाई : केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने और आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजे का आश्वासन दिया। इसके बाद सीजेपी ने तत्काल प्रभाव से आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी।

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