वंदे मातरम लिखा कब गया?
वंदे मातरम के रचयिता बंगाल के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसकी रचना सात नवंबर 1875 को हुई और पहली बार इसे साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया। बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वंदे मातरम पहली बार 1882 में लिखा गया था। 1875 में इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन हुआ, जबकि 1882 में यह आनंद मठ का हिस्सा बना।
‘वंदे मातरम’ का सरल अर्थ है- मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।
यहां मां से आशय मातृभूमि से है। आनंदमठ की कहानी संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें ‘संतान’ कहा गया है। ये लोग अपनी मातृभूमि के लिए जीवन समर्पित करते हैं। इसी कहानी में वंदे मातरम गीत आता है। गीत में मातृभूमि को मां के रूप में देखा गया है और उसकी धरती, हरियाली, पानी, फसल और सुंदरता का वर्णन किया गया है।
1896 में पहली बार कांग्रेस के मंच पर गूंजा वंदे मातरम
वंदे मातरम को राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी पहचान 1896 में मिली। कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यहां रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम गाया। यही वह समय था जब यह गीत साहित्य की दुनिया से निकलकर देश के राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनने लगा। इसके बाद कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों में भी वंदे मातरम की मौजूदगी बढ़ती गई।
1905 में वंदे मातरम नारे में बदल गया
वंदे मातरम की कहानी में 1905 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक है। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया। इसके खिलाफ पूरे बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का अभियान चलने लगा। सात अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकले एक बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने वंदे मातरम और दूसरे नारे लगाए। इसी मौके पर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। सरकारी रिकॉर्ड इसे वंदे मातरम के राजनीतिक नारे के रूप में शुरुआती बड़े इस्तेमालों में गिनता है। यहीं से वंदे मातरम सिर्फ गीत नहीं रहा। यह अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का नारा भी बन गया। उसी साल कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया।
अक्टूबर 1905: बना 'वंदे मातरम संप्रदाय'
वंदे मातरम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी। अक्टूबर 1905 में उत्तरी कलकत्ता में 'वंदे मातरम संप्रदाय' नाम से एक समूह बनाया गया। इसके सदस्य हर रविवार प्रभात फेरियां निकालते और वंदे मातरम गाते थे। वे मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक दान भी लेते थे। इन प्रभात फेरियों में कभी-कभी रवींद्रनाथ ठाकुर भी शामिल होते थे। यानी गीत अब किताब और कांग्रेस के मंच से आगे निकलकर आम लोगों के बीच पहुंच चुका था।
अंग्रेजों ने वंदे मातरम पर सख्ती क्यों की?
ब्रिटिश सरकार को धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि वंदे मातरम लोगों को आंदोलन से जोड़ रहा है। इसीलिए इसे रोकने की कोशिश शुरू हुई। नवंबर 1905 में बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाया गया। उन पर वंदे मातरम का जाप करने का आरोप था। पूर्वी बंगाल में स्कूल-कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या इसका नारा लगाने पर रोक लगाने वाले आदेश भी जारी किए गए। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ। जिस गीत को रोकने की कोशिश की गई, उसकी आवाज और दूर तक पहुंचने लगी।
1906: बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों का जुलूस
अप्रैल 1906 में बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम के नारे लगाने पर रोक लगा दी। सम्मेलन को भी रोक दिया गया। इसके बावजूद प्रतिनिधियों ने नारे लगाना जारी रखा और पुलिस की कार्रवाई का सामना किया। इसके बाद 20 मई 1906 को बारीसाल में 10 हजार से ज्यादा लोगों ने वंदे मातरम के झंडे लेकर जुलूस निकाला। खास बात यह थी कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग शामिल थे। यह घटना बताती है कि शुरुआती दौर में वंदे मातरम को लेकर आंदोलन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी भी थी।
1907-08: देश के दूसरे हिस्सों में भी गूंज
वंदे मातरम का असर बंगाल तक सीमित नहीं रहा। 1907 में लाहौर में युवाओं के प्रदर्शनों में इसके नारे लगे। 1908 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में मजदूर आंदोलन के दौरान भी वंदे मातरम के नारे सुनाई दिए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मुकदमे के दौरान मुंबई में भी बड़ी संख्या में लोगों ने वंदे मातरम गाकर उनके प्रति समर्थन जताया। यानी बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में वंदे मातरम देश के अलग-अलग हिस्सों में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन चुका था।