1955 से 2015 तक के फिल्मी गीतों की धुनों ने पुरानी यादों, प्रेम, उल्लास और जीवन के विविध रंगों से जोड़ा
भोपाल : सोमवार, नवम्बर 2, 2026, 21:51 IST
प्रदेश का 71वें स्थापना दिवस समारोह का दूसरे दिन विविध सांस्कृतिक रंगों, लोक-सुरों और उल्लास से गुलजार रहा। प्रदेश की गौरवशाली विरासत, समृद्ध लोक परंपराओं और विकास की जीवंत गाथा को समेटे राज्योत्सव में उत्साह और उमंग का अनूठा संगम देखने को मिला। परिसर में सजीं विविध प्रदर्शनियों ने जहां मध्यप्रदेश की विकास यात्रा, जनकल्याणकारी योजनाओं और कृषि क्षेत्र में नवाचारों की झलक प्रस्तुत की, वहीं देशज व्यंजन मेले ने प्रदेश के स्वाद से नागरिकों को परिचित कराया। साथ ही कृषि केंद्रित सेमिनार का आयोजन भी किया गया। सायंकाल लोक एवं जनजातीय नृत्यों की मनोहारी प्रस्तुतियों ने प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को साकार किया, जबकि ‘अनुगूँज–ब्रीदिंग फिएस्टा’ की सुरमयी वाद्य प्रस्तुतियों ने वातावरण को संगीतमय बना दिया। राज्योत्सव का दूसरा दिन मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता, रचनात्मक ऊर्जा और गौरवपूर्ण परंपराओं का उत्सव बनकर सामने आया।
जनजातीय लोकजीवन की ऊर्जा और सामूहिक उल्लास को किया अभिव्यक्त
पूर्वरंग अंतर्गत मध्यप्रदेश एवं अन्य राज्यों की लोक एवं जनजातीय नृत्य प्रस्तुतियां हुईं। इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश का गोंड करमा, बैगा करमा, गोंड गुदुमबाजा, सहरिया जनजाति का लहंगी, भील का भगोरिया, बधाई एवं डंडा नृत्य हुआ, जबकि अन्य राज्य के नृत्यों में हरियाणा का घूमर, राजस्थान का सपेरा एवं छत्तीसगढ़ का पंथी नृत्य हुआ। गोण्ड जनजातीय करमा नृत्य में प्रकृति से निकटता, सामुदायिक सहभागिता और पारंपरिक लय का सुंदर समन्वय देखने को मिला। इस नृत्य को डिण्डोरी की सुश्री रोशनी भार्वे एवं साथी द्वारा प्रस्तुत किया गया। बैगा जनजातीय करमा नृत्य बैगा समुदाय के सामुदायिक जीवन, प्रकृति के प्रति आत्मीयता और उत्सवी उल्लास का प्रतिनिधित्व कर रहा था। इसे डिण्डोरी के श्री लालसिंह मरकाम एवं साथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसके बाद गोण्ड जनजातीय गुदुमबाजा नृत्य में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और लयबद्ध नृत्य का आकर्षण देखने को मिला। इसे श्री अशोक कुमार मार्को एवं साथियों ने प्रस्तुत किया। सहरिया जनजातीय लहंगी नृत्य ने जनजातीय लोकजीवन की ऊर्जा और सामूहिक उल्लास को अभिव्यक्त किया। यह प्रस्तुति श्योपुर के श्री रामलखन आदिवासी एवं साथी द्वारा दी गई। भील जनजातीय भगोरिया नृत्य पश्चिमी मध्यप्रदेश की जनजातीय संस्कृति के उल्लासपूर्ण रंगों को सामने लाया। इसे धार के श्री राहुल भावर एवं साथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया। बधाई नृत्य ने बुंदेलखंड और मध्यप्रदेश के अन्य क्षेत्रों में शुभ अवसरों, मांगलिक प्रसंगों एवं उत्सवों से जुड़ी लोकपरंपराओं को दर्शकों के सामने दिखाया। इसे सुश्री ज्ञानेश्वरी नायडू एवं साथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया। अगले क्रम में डण्डा नृत्य हुआ, जिसमें डण्डों की लयबद्ध गतियों, सामूहिक तालमेल और पारंपरिक संगीत देखने को मिला। इसे हरदा के श्री विकास शुक्ला एवं साथी द्वारा प्रस्तुत किया गया।
सर्प की गति से प्रेरित नृत्याभिव्यक्तियां
अन्य राज्यों की प्रस्तुतियों में हरियाणा का घूमर नृत्य प्रस्तुत हुआ। पारंपरिक रंगीन घाघरा-ओढ़नी पहने महिला कलाकार गोलाकार घूमती हुई लयबद्ध पदचाल और आकर्षक मुद्राओं के साथ नृत्य करती हैं। इसे सोनीपत की सुश्री सुनीता एवं साथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसके बाद राजस्थान का सपेरा नृत्य की प्रस्तुति हुई। कालबेलिया समुदाय से जुड़ी प्रसिद्ध लोकनृत्य परंपरा का प्रतिनिधित्व करते इस नृत्य में लहराती गतियों, आकर्षक मुद्राओं और पारंपरिक वेशभूषा के माध्यम से कलाकारों ने सर्प की गति से प्रेरित नृत्याभिव्यक्ति प्रस्तुत की। इसे जयपुर के श्री सुरमनाथ कालबेलिया एवं साथी ने प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण लोक नृत्य परम्परा पंथी ने सतनामी समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं को प्रदर्शित किया। दुर्ग के श्री दिनेश कुमार जांगड़े एवं साथी इस नृत्य की प्रस्तुति दी।
'अनुगूँज — द ब्रीदिंग फिएस्टा’
संगीत जब शब्दों की सीमाएँ पार कर साँसों के सहारे दिल तक पहुँचता है, तब जन्म लेती है एक अनूठी अनुभूति। इसी संगीतात्मक कल्पना को साकार किया ‘अनुगूँज — द ब्रीदिंग फिएस्टा’ वॉयस ऑफ विंड, भोपाल के कलाकारों ने। इस प्रस्तुति में हिंदी सिनेमा के सदाबहार गीतों को हार्मोनिका, मेलोडिका, बाँसुरी और सैक्सोफोन जैसे विंड इंस्ट्रूमेंट के माध्यम से नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया। ‘अनुगूँज’ का भाव है — एक स्वर के समाप्त होने के बाद भी उसकी मिठास का मन में लंबे समय तक बने रहना। इसी भाव को केंद्र में रखकर तैयार इस संगीत यात्रा ने वर्ष 1955 से 2015 तक के लोकप्रिय फिल्मी गीतों की धुनें श्रोताओं को पुरानी यादों, प्रेम, उल्लास, विरह और जीवन के विविध रंगों से जोड़ दिया। इस प्रस्तुति की विशेषता यह है कि गीतों के शब्दों के बिना भी उनकी पहचान, भाव और लोकप्रियता वाद्ययंत्रों के सुरों में जीवंत रही।
कलाकारों की सुरमयी प्रस्तुति
कार्यक्रम में भोपाल के प्रतिभाशाली कलाकारों ने अपनी वाद्य-साधना से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। हार्मोनिका पर डॉ. सुरेश सोनी ‘रमैया वस्तावैया’, श्री अभय जपे ‘मैं शायर तो नहीं’ और ‘दम मारो दम’, श्री सी. एस. श्रीवास्तव ‘आओ हुजूर तुमको’, श्री शंकर राव ‘कजरा ओ दिल दीवाने’ और ‘याद आ रहा है तेरा प्यार’, श्री पी. के. जड़िया ‘डम डम डिगा डिगा’ तथा श्रीमन शुक्ला मेलोडिका पर ‘नीले नीले अंबर पर’ प्रस्तुत किया। बाँसुरी पर श्री कुणाल गजभिये ‘मोह मोह के धागे’ और ‘मय से मीना से ना’ की मधुर धुनें सुनाई। युवा प्रतिभा सुश्री सिद्धि सोनी ने सैक्सोफोन पर ‘जाने जाँ ढूँढ़ता फिर रहा’ और हार्मोनिका पर ‘रमता जोगी’ प्रस्तुत किया। सुश्री कल्पना श्रीवास्तव ने हार्मोनिका और यूकुलेले पर अंग्रेजी गीत ‘Brown Girl in the Ring’ की विशेष प्रस्तुति दी। इसके साथ ही वॉयस ऑफ विंड समूह के कलाकारों ने सामूहिक प्रस्तुति ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना’ के माध्यम से संगीत की सामूहिक ऊर्जा का अनुभव कराया। प्रस्तुति में की-बोर्ड पर श्री केदार चौहान, ऑक्टापैड पर श्री अजय डांडे, लीड गिटार पर श्री संजीव झा, बेस गिटार पर श्री दुष्यंत सचदेवा और हैंडसोनिक पर श्री जीतू ने अपनी संगत से कार्यक्रम में विविधता और ऊर्जा भर दी।
लोक गायक मामे खान के सुरों से सजेगी राज्योत्सव की अंतिम संध्या
मध्यप्रदेश स्थापना दिवस समारोह के तीसरे एवं अंतिम दिवस 03 नवम्बर, 2026 को दोपहर 12 बजे से रात्रि 8 बजे तक नागरिक लाल परेड ग्राउंड, भोपाल में विभिन्न प्रदर्शनियों का अवलोकन कर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, विकास यात्रा और उपलब्धियों से परिचित हो सकेंगे। देशज व्यंजन मेले में मध्यप्रदेश के विविध अंचलों के व्यंजनों के स्वाद का आनंद भी लिया जा सकेगा। सायं 6:30 बजे से कृषि आधारित और पारंपरिक लोक - जनजातीय नृत्यों की मनोहारी प्रस्तुतियां होंगी। इसके बाद सुविख्यात लोक गायक श्री मामे खान एवं साथी, जैसलमेर द्वारा लोक गायन की प्रस्तुति दी जाएगी। राजस्थान की माटी से जुड़े श्री मामे खान अपनी विशिष्ट आवाज, ऊर्जावान गायिकी और राजस्थानी लोक संगीत की समृद्ध परंपरा को वैश्विक मंचों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। उनकी गायिकी में राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, लोकजीवन की सहजता और सुरों की अनूठी मिठास का सुंदर संगम मिलता है। उनकी प्रस्तुति में लोकगीतों की आत्मीयता और संगीत की जीवंत लय राज्योत्सव की अंतिम संध्या को विशेष रंग प्रदान करेगी। लोक एवं जनजातीय संस्कृति और राजस्थान के लोक संगीत का यह संगम राज्योत्सव के समापन दिवस को स्मरणीय बनाएगा।
अनुराग उइके