छात्र संख्या के आधार पर स्कूलों को मिलेगी वार्षिक अनुदान राशि
न्यूनतम 10 हजार से लेकर अधिकतम 1 लाख रुपये तक का फंड जारी
भोपाल। राज्य के स्कूलों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने और छात्र सुविधाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से राज्य शिक्षा केंद्र ने वार्षिक अनुदान राशि जारी करने के संबंध में नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब प्रदेश के स्कूलों को उनके नामांकित छात्रों की संख्या के आधार पर प्रतिवर्ष 10 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक का फंड उपलब्ध कराया जाएगा।
निर्देश कअनुसार 30 तक छात्र होने पर 10 हजार रूपए, 31 से 100 छात्र होनेपर 25 रुपए, 101 से 250 छात्र 50 रूपए, 251 से 1,000 छात्र होने पर 75 हजार रूपए और 1,001 से अधिक छात्र होने पर 1 लाख रूपए अनुदान दिया जाना तय किया गया है। इस अनुदान राशि का उपयोग भवन मरम्मत, बिजली, पेयजल, लाइब्रेरी, खेल एवं शैक्षणिक उपकरण, फर्नीचर, स्टेशनरी तथा सांस्कृतिक आयोजनों के लिए किया जाएगा। इसी राशि में स्वच्छ विद्यालय एक्शन प्लान का बजट भी शामिल रहेगा।
स्कूल मैनेजमेंट कमेटी ट्रेनिंग के लिए अतिरिक्त फंड
नियमित अनुदान के अलावा, स्कूलों में बैगलेस डे की गतिविधियों के संचालन हेतु प्रति स्कूल 5 हजार रूपए का अतिरिक्त फंड दिया जाएगा। वहीं, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की ट्रेनिंग के लिए 1 हजार रूपए दिए जाएंगे। स्कूल मैनेजमेंट कमेटी सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार बजट स्वीकृत करेगी और फंड का कोई भी खर्च कमेटी की पूर्व मंजूरी के बिना नहीं हो सकेगा।
दीवार पर लिखना होगा हिसाब
फंड के उपयोग में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सभी स्कूलों को प्राप्त अनुदान का ब्योरा अपनी बाहरी दीवार पर प्रदर्शित करना होगा। यह जानकारी काले पेंट पर सफेद अक्षरों में लिखी जाएगी, जिससे अभिभावक, गांव वाले और स्थानीय समुदाय स्कूल के वित्तीय आवंटन के बारे में जागरूक हो सकें।
सीपीसीटी की अनिवार्यता के खिलाफ मंत्रालय के सामने किया प्रदर्शन
भोपाल। आठ माह से लंबित महंगाई भत्ते और सीपीसीटी की बाध्यता सहित विभिन्न मांगों को लेकर तृतीय वर्ग कर्मचारी संगठन ने मंगलवार को मंत्रालय के सामने जोरदार प्रदर्शन किया। नारेबाजी करते हुए कर्मचारियों ने सरकार की नीतियों के प्रति विरोध दर्ज कराया और लंबित मांगों का तुरंत निराकरण करने की गुहार लगाई।
तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ मध्य प्रदेश के महामंत्री उमाशंकर तिवारी के नेतृत्व में आयोजित इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में संघ के पदाधिकारी और कर्मचारी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने शासन से मांग की कि प्रदेश में कार्यरत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को 1 जनवरी 2026 से 2 प्रतिशत महंगाई भत्ता और महंगाई राहत तुरंत प्रदान की जाए। संघ ने नवनियुक्त कर्मचारियों को तीन साल की परिवीक्षा अवधि के दौरान क्रमशः 70, 80 और 90 प्रतिशत वेतन दिए जाने के प्रावधान को समाप्त करने पर विशेष बल दिया। संघ के अनुसार, इस व्यवस्था से हर कर्मचारी को करीब 1.74 लाख से 4 लाख रुपए तक का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। इसके साथ ही, कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री द्वारा घोषित कैशलेस इलाज सुविधा को धरातल पर उतारने की मांग की। संघ का कहना है कि घोषणा के बावजूद अभी तक कर्मचारियों को इस योजना का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है, इसलिए इसे अविलंब लागू किया जाना चाहिए।
ई-अटेंडेंस खत्म करने की मांग
कर्मचारी नेताओं ने स्पष्ट किया कि सीधी भर्ती में सीपीसीटी की अनिवार्यता रखी जा सकती है, लेकिन अनुकंपा नियुक्ति और चतुर्थ श्रेणी से तृतीय श्रेणी में पदोन्नति के मामलों में इसकी बाध्यता पूरी तरह समाप्त होनी चाहिए। अनुकंपा आधार पर मिलने वाली नियुक्तियों में सीपीसीटी की छूट देने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई गई। इसके अतिरिक्त, कर्मचारियों ने ई-अटेंडेंस की व्यवस्था को भी तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का आग्रह किया।
आदिवासी वोट बैंक साधने की तैयारी, ब्लॉक स्तर पर संगठन मजबूत करेगी कांग्रेस
पिछले पांच चुनावों के चुनावी आंकड़े दे रहे सतर्क रहने का संदेश
भोपाल। प्रदेश में अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत करने और आदिवासी वोट बैंक को पूरी तरह अपने पाले में बनाए रखने के लिए कांग्रेस पार्टी ने एक व्यापक और नया मास्टरप्लान तैयार किया है। पार्टी अब सिर्फ पारंपरिक राजनीति तक सीमित न रहकर ज़मीनी स्तर पर संगठन का कायाकल्प करने जा रही है। इसके तहत प्रदेश के सभी 89 आदिवासी विकासखंडों (ब्लॉक) में संगठन का विस्तार किया जाएगा और नए, ऊर्जावान नेतृत्व को आगे लाया जाएगा।
इस अभियान के तहत आदिवासी समाज के प्रबुद्ध वर्ग को पार्टी से जोड़ना है। कांग्रेस अब डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और समाजसेवियों का एक सशक्त नेटवर्क तैयार कर रही है। इनके साथ विशेष सम्मेलनों का आयोजन किया जाएगा, ताकि समाज की वास्तविक समस्याओं और अपेक्षाओं पर सीधा फीडबैक मिल सके। इसी फीडबैक के आधार पर आदिवासी कांग्रेस अपनी आगामी राजनीतिक कार्ययोजना और नीतियों को अंतिम रूप देगी। इसके साथ ही, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की अध्यक्षता में गठित विशेष समूह विभिन्न जिलों में जाकर लगातार संवाद कार्यक्रम आयोजित करेगा। मध्य प्रदेश के 89 आदिवासी ब्लॉक में फैलीं 47 विधानसभा और 6 लोकसभा आरक्षित सीटें राज्य की सत्ता की कुंजी मानी जाती हैं। हालांकि, बीते दो चुनावों में कांग्रेस को आदिवासी मतदाताओं का अच्छा समर्थन मिला है, लेकिन चुनावी इतिहास सतर्क करने वाला है।
पारंपरिक वोट बैंक को सुरक्ष्ज्ञित रखने की रणनीति
आदिवासी कांग्रेस के पदाधिकारियों का कहना है कि अपने इस पारंपरिक वोट बैंक को सुरक्षित रखने और पैठ को और गहरा करने के लिए यह रणनीति बनाई गई है। यह मॉडल केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे देश के अन्य राज्यों में भी चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
उतार-चढ़ाव भरा रहा पांच चुनावों का सफर
यदि पिछले पांच विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। 2003 में आरक्षित 41 सीटों में से कांग्रेस मात्र 2 सीटों पर सिमट गई थी। 2008 में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़कर 47 हुई, जिसमें कांग्रेस ने 17 सीटें जीतीं। वहीं 2013 में पार्टी को केवल 15 सीटों से संतोष करना पड़ा। इसके बाद 2018 में कांग्रेस ने वापसी करते हुए 30 सीटों पर कब्ज़ा जमाया और सरकार बनाई। वर्ष 2023 के चुनाव में यह आंकड़ा घटकर 22 सीटों पर आ गया।
टीईटी विवाद, चयन मंडल ने जारी किया शेड्यूल, विभाग मौन, शिक्षकों में असमंजस
कांग्रेस का सरकार पर हमला, भाजपा बोली अदालत के आदेश का करेंगे पालन
भोपाल। प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर उपजा विवाद और असमंजस अब चरम पर पहुंच गया है। एक ओर मप्र कर्मचारी चयन मंडल ने परीक्षा का टाइमटेबल घोषित कर दिया है, तो दूसरी ओर स्कूल शिक्षा विभाग की चुप्पी ने वर्षों से सेवाएं दे रहे शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। इस बीच, विपक्षी दल कांग्रेस के हमलावर रुख के बाद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट किया है कि सरकार अदालत के आदेशों का अक्षरशः पालन करेगी।
कर्मचारी चयन मंडल द्वारा जारी समय-सारणी के अनुसार, परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन 21 अगस्त से शुरू होकर 4 सितंबर तक चलेंगे, जबकि परीक्षा 12 अक्टूबर को आयोजित की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत 2009 तक नियुक्त सभी सेवारत शिक्षकों के लिए 3 वर्ष के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य किया गया है। हालांकि, जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में 5 वर्ष से कम का समय बचा है, उन्हें इस अनिवार्यता से छूट प्रदान की गई है।
वादों और जमीनी हकीकत पर उठे सवाल
स्कूल शिक्षा विभाग ने पूर्व में 2006 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को राहत दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी, लेकिन अब तक ऐसी किसी याचिका की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है। वहीं दूसरी ओर, मप्र शिक्षक संघ ने अदालती फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है, जिस पर सुनवाई होना अभी बाकी है।
30 अगस्त को दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शन
टीईटी की अनिवार्यता के विरोध में देश भर के शिक्षकों का असंतोष सड़कों पर उतरने लगा है। ज्वाइंट टीचर्स फ्रंट के बैनर तले 18 राज्यों के लाखों शिक्षक 30 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा आंदोलन करने जा रहे हैं। इस राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों के शिक्षक हिस्सा लेंगे।
कांग्रेस का अध्यादेश लाने का सुझाव
इस मुद्दे पर प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कांग्रेस नेताओं ने सरकार को घेरते हुए कहा कि 20-22 सालों से पढ़ा रहे अनुभवी शिक्षकों को परीक्षा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कांग्रेस की मांग है कि केंद्र सरकार शिक्षकों के सम्मान की रक्षा के लिए तत्काल अध्यादेश लाए। वहीं कांग्रेस के हमलों का जवाब देते हुए भाजपा ने कहा है कि सरकार न्यायपालिका के आदेशों के पालन के प्रति प्रतिबद्ध है। पार्टी ने दोहराया कि वर्तमान सरकार पूरी तरह से शिक्षक हितैषी है और शिक्षकों की सभी मांगों को ध्यानपूर्वक सुनकर उनके हित में ही निर्णय लिए जा रहे हैं।
पहचान बचाने सड़कों पर जेन अल्फा, रीजनल स्कूल को केवी में विलय करने का विरोध
भोपाल। राजधानी भोपाल में मंगलवार को उस वक्त नया इतिहास रचा गया, जब किसी शैक्षणिक संस्थान की स्वायत्तता की रक्षा के लिए पहली बार जेन अल्फा (स्कूली बच्चे) सड़कों पर उतर आई। रीजनल स्कूल के करीब 300 से 400 छात्र-छात्राओं ने केंद्रीय विद्यालय संगठन में स्कूल के प्रस्तावित संविलयन के खिलाफ प्रदर्शन किया।
हाथों में सेव डीएमएस की तख्तियां थामे इन नौनिहालों ने केवल नारेबाजी ही नहीं की, बल्कि अपनी अनूठी शैक्षणिक पहचान और नवाचार की विरासत को बचाने के लिए हुंकार भी भरी। प्रदर्शनकारी छात्रों और उनके साथ आए अभिभावकों का स्पष्ट कहना है कि डीएमएस केवल एक पारंपरिक विद्यालय नहीं, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में नए प्रयोगों और नवाचारों की प्रयोगशाला है। केंद्रीय विद्यालय संगठन के अधीन जाने से इसका मूल ढांचा, स्वतंत्र शैक्षणिक स्वरूप और नवाचार की स्वतंत्रता पूरी तरह प्रभावित होगी।
प्राचार्य को सौंपा ज्ञापन, आंदोलन की दी चेतावनी
अपनी मांगों के समर्थन में छात्रों ने रीजनल कॉलेज के प्राचार्य को एक ज्ञापन सौंपा। इसमें संविलयन की पूरी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोकने का आग्रह किया गया है। छात्रों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे इस विरोध-प्रदर्शन को चरणबद्ध तरीके से और अधिक तेज करेंगे।
शक्कर की मिठास पड़ी फीकी, 17 दिनों में 17 रूपए उछले दाम
भोपाल। आगामी त्योहारों से ठीक पहले राजधानी भोपाल में शक्कर की आसमान छूती कीमतों ने आम जनता का जायका बिगाड़ दिया है। व्यापारी भी बढ़ती कीमतों को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। पिछले दो-तीन हफ्तों से जारी तेजी के बीच बीते महज 17 दिनों में ही शक्कर के दाम 17 प्रति किलो तक उछल चुके हैं। बाजार में लगातार बढ़ती इस महंगाई से इस बार त्योहारी सीजन में आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है।
राजधानी भोपाल के थोक बाजार में शक्कर की कीमत 60 प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई है। यदि यही रुझान जारी रहा, तो खुदरा दुकानों पर शक्कर 65 प्रति किलो के आंकड़े को छू सकती है। शक्कर महंगी होने से आने वाले दिनों में मिठाई और बेकरी उत्पादों की कीमतों में 5 से 10 प्रतिशत’’ की बढ़ोतरी होने की आशंका है। त्योहारों से पहले शक्कर के दामों में आई इस अप्रत्याशित तेजी से घरेलू बजट बिगड़ने की पूरी संभावना है, जिससे रक्षाबंधन और आगामी पर्वों पर मिठाइयों की मिठास पर महंगाई का साया मंडराने लगा है।
दामों में तेजी की मुख्य वजह
शक्कर के दामों में आई तेजी की वजह को कम बारिश के कारण गन्ने की पैदावार प्रभावित होना। साथ ही शक्कर के कुल उत्पादन और आपूर्ति में गिरावट आना भी बताया जा रहा है। इसके अलावा गन्ने के रस का उपयोग एथेनॉल बनाने में अधिक होने से शक्कर की उपलब्धता सीमित होना।