भोजशाला पर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, मुस्लिम और जैन दोनों दावे खारिज, मंदिर मान्यता पर मुहर

इंदौर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार स्थित बहुचर्चित भोजशाला विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए परिसर को देवी वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर माना है. अदालत ने न केवल मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं को खारिज किया, बल्कि जैन समाज की ओर से किए गए दावे को भी स्वीकार नहीं किया. 242 पन्नों के विस्तृत फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, पुरातात्विक साक्ष्य और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई की रिपोर्टें इस बात की पुष्टि नहीं करतीं कि विवादित परिसर कभी जैन मंदिर था.

मुख्य न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कई याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया. अदालत के सामने हिंदू पक्ष, मुस्लिम पक्ष और जैन समुदाय की अलग-अलग दावेदारियां थीं. हिंदू संगठनों ने भोजशाला को मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताते हुए मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति देने वाले 2003 के एएसआई आदेश को चुनौती दी थी. वहीं मुस्लिम पक्ष ने इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हुए नमाज के अधिकार को बनाए रखने की मांग की थी. इसी बीच जैन समुदाय की ओर से भी दावा किया गया कि यह स्थल मूल रूप से जैन मंदिर था और यहां स्थापित प्रतिमा देवी सरस्वती की नहीं बल्कि जैन देवी अंबिका की थी.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भोजशाला परिसर का धार्मिक स्वरूप हिंदू मंदिर का है और यहां देवी वाग्देवी की पूजा का ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद है. अदालत ने 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया जिसमें शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी. फैसले में कहा गया कि विवादित स्थल पर पूजा-अर्चना का अधिकार हिंदू पक्ष को प्राप्त होगा जबकि प्रशासनिक नियंत्रण एएसआई के पास ही रहेगा.

जैन पक्ष की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि भोजशाला परिसर से मिली 1091 ईस्वी की एक शिलालेख युक्त प्रतिमा वास्तव में जैन देवी अंबिका की है. यह प्रतिमा फिलहाल लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गई बताई गई. याचिकाकर्ता सालेक चंद जैन ने दावा किया कि शिलालेख में वाग्देवी का उल्लेख जरूर है, लेकिन मुख्य रूप से अंबिका प्रतिमा का निर्माण वर्णित है. याचिका में यह भी कहा गया कि भोजशाला की वास्तुकला राजस्थान के माउंट आबू स्थित जैन मंदिरों से मेल खाती है और जैन समुदाय को यहां पूजा का अधिकार मिलना चाहिए.

हालांकि अदालत ने इस दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. फैसले में कहा गया कि यदि यह मान भी लिया जाए कि संबंधित प्रतिमा अंबिका की है, तब भी इससे यह साबित नहीं होता कि पूरा विवादित परिसर जैन मंदिर था. अदालत ने कहा कि “ऐतिहासिक, पुरातात्विक और एएसआई सर्वेक्षणों में कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि विवादित क्षेत्र जैन मंदिर था.” कोर्ट ने साफ कहा कि प्रतिमा के स्वरूप से पूरे परिसर की धार्मिक पहचान निर्धारित नहीं की जा सकती.

फैसले में एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि जैन धर्म भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में हिंदू धर्म की शाखा के रूप में विकसित हुआ है. अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कानूनों में जैन और बौद्ध समुदायों को हिंदू श्रेणी में शामिल माना गया है. कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू और जैन परंपराओं में कई देवी-देवताओं और प्रतीकों की समानता मिलती है, इसलिए किसी हिंदू मंदिर परिसर में जैन प्रतिमाओं की उपस्थिति असामान्य नहीं मानी जा सकती.

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वाग्देवी प्रतिमा के आसपास गणेश और दुर्गा की आकृतियां मौजूद हैं, जो हिंदू परंपरा का स्पष्ट संकेत देती हैं. फैसले में कहा गया कि प्रतिमा के पीछे जैन तीर्थंकर या साधक की आकृति का होना केवल सांस्कृतिक सह अस्तित्व का उदाहरण हो सकता है, इससे मंदिर का मूल स्वरूप नहीं बदलता.

मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि भोजशाला राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत अध्ययन और मां सरस्वती की उपासना का प्रमुख केंद्र था. उन्होंने कहा कि मुस्लिम आक्रमणों के दौरान मंदिर को क्षति पहुंचाई गई और बाद में इसे मस्जिद के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हुई. अदालत के समक्ष एएसआई की रिपोर्ट, ऐतिहासिक गजेटियर, संस्कृत शिलालेख और पुरातात्विक साक्ष्य भी पेश किए गए.

फैसले में कोर्ट ने यह भी माना कि भोजशाला परिसर में संस्कृत व्याकरण से जुड़े शिलालेख, देवी सरस्वती से संबंधित उल्लेख और प्राचीन हिंदू स्थापत्य शैली के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं. अदालत ने कहा कि यह स्थल ऐतिहासिक रूप से ज्ञान, शिक्षा और धार्मिक उपासना का केंद्र रहा है. कोर्ट ने इस मामले में अयोध्या फैसले के सिद्धांतों का भी उल्लेख किया और कहा कि विवादित धार्मिक स्थलों के मामलों में ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं.

मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं को खारिज करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि यदि मुस्लिम समुदाय आवेदन देता है तो धार जिले में मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराने पर विचार किया जा सकता है. हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि भोजशाला परिसर में नमाज की अनुमति अब नहीं दी जाएगी.

फैसले के बाद धार और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई. प्रशासन ने भोजशाला परिसर के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया. हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे ऐतिहासिक विजय बताया, जबकि मुस्लिम संगठनों ने फैसले का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी रणनीति तय करने की बात कही है. जैन समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने भी अदालत की टिप्पणियों पर असहमति जताई है.

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें अदालत ने भोजशाला विवाद के तीनों प्रमुख दावों पर स्पष्ट रुख अपनाया है. कोर्ट ने हिंदू पक्ष के दावे को स्वीकार करते हुए परिसर को मंदिर माना, मुस्लिम पक्ष के नमाज अधिकार को निरस्त किया और जैन समुदाय के ऐतिहासिक दावे को भी पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया. पूरे देश की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी या यह विवाद यहीं समाप्ति की ओर बढ़ेगा.


Leave Comments

Top