एनएफएचएस-6 की रिपोर्ट में खुलासा, संस्थागत प्रसव में ग्रामीण क्षेत्र अब भी आगे
भोपाल। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के हालिया आंकड़ों ने प्रदेश में प्रसव देखभाल और स्वास्थ्य प्राथमिकताओं की नई तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में संस्थागत प्रसव कराने को लेकर जागरूकता देखी गई है, जो कई मायनों में शहरों को भी पीछे छोड़ रही है। हालांकि, इसके उलट शहरी क्षेत्रों में सिजेरियन आपरेषन के जरिए होने वाले प्रसव का चलन तेजी से बढ़ा है, जो ग्रामीण इलाकों की तुलना में तीन गुना अधिक दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में सिजेरियन डिलीवरी की दर 33.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी शहरों में होने वाले हर तीन प्रसव में से एक प्रसव बड़े ऑपरेशन के जरिए हो रहा है। इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा नियंत्रित और महज 11 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का मानना है कि गांवों में शारीरिक सक्रियता और प्राकृतिक प्रसव को प्राथमिकता देना इसकी मुख्य वजह हो सकती है, जबकि शहरों में बदलती जीवनशैली और निजी अस्पतालों का बढ़ता प्रभाव इस अंतर को बड़ा कर रहा है।
सरकारी अस्पतालों पर ग्रामीणों का भरोसा
रिपोर्ट में स्वास्थ्य ढांचे को लेकर एक सुखद संदेश भी देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग निजी क्लिनिकों के बजाय सरकारी व्यवस्था पर सबसे ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में होने वाले कुल संस्थागत जन्मों में से 79.8 प्रतिशत प्रसव सरकारी (सार्वजनिक) स्वास्थ्य सुविधाओं में दर्ज किए गए हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 66.2 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत प्रसव की कुल दर 87.9 प्रतिशत रही है।
निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू निजी स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। आंकड़ों के अनुसार, यदि कोई गर्भवती महिला निजी अस्पताल का रुख करती है, तो उसके ऑपरेशन की संभावना 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाती है। 2023-24 के दौरान निजी अस्पतालों में कुल 61.7 प्रतिशत प्रसव सिजेरियन के जरिए हुए हैं (शहरों में 63.2 प्रतिशत और गांवों में 60.1 प्रतिशत)। इसके मुकाबले सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन की कुल दर मात्र 10.4 प्रतिशत ही है।