Datia By-Election: दतिया में नरोत्तम मिश्रा फैक्टर फेल या भाजपा की रणनीति में चूक? हार के बाद उठे ये सवाल

डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल संपाल Updated Mon, 03 Aug 2026 07:07 PM 

कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार दतिया में भाजपा को हराया। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को दी मात। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा के बूथ पर भी भाजपा को मिली हार।

Datia Defeat: Did Narottam Mishra's Influence Fail or Did BJP's Strategy Misfire
 
दतिया उपचुनाव 2026 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

मध्यप्रदेश के दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार सिर्फ एक सीट गंवाने भर की कहानी नहीं है। इस नतीजे ने पार्टी की टिकट चयन से लेकन चुनावी रणनीति तक पर कई सवाल खड़े कर दिए है। सबसे ज्यादा चर्चा उस फैसले की है, जिसमें भाजपा ने अपनी परंपरागत सीट पर पूर्व गृहमंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा था।

समर्थकों की दूरी भी भाजपा की हार की बड़ी वजह?
पूरे चुनाव में मिश्रा चर्चा के केंद्र में रहे। टिकट नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने खुद को चुनाव से अलग नहीं किया। प्रचार में सक्रिय रहे, कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क बनाए रखा और कई मौकों पर भावुक भी नजर आए। उन्होंने पार्टी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को जिताने के लिए मैदान भी संभाला, लेकिन जीत नहीं दिला सके। हालांकि उनका परिवार और समर्थक भी पहले की तरह सक्रिय दिखाई नहीं दिए। उनके बेटे भी चुनाव में गिने चुने मौकों पर ही नजर आए। नतीजों के बाद चर्चा है कि नरोत्तम मिश्रा खेमा उम्मीद के मुताबिक सक्रिय नहीं दिखा। समर्थकों की दूरी भी भाजपा की हार की बड़ी वजह मानी जा रही है। इस नतीजे का असर मिश्रा की राजनीति पर भी पड़ सकता है। दतिया लंबे समय से उनकी राजनीतिक पहचान का सबसे मजबूत गढ़ रहा है। ऐसे में इस सीट पर भाजपा की हार को उनके राजनीतिक प्रभाव से जोड़कर भी देखा जाएगा।
दतिया उपचुनाव का नतीजा मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनकी सरकार के लिए भी सियासी झटका माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ने चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने दतिया में 11,500 करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश, नए उद्योग और विकास परियोजनाओं का ऐलान किया। रोड शो भी किया। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी दतिया में मोर्चा संभाला। संगठन के साथ सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी चुनावी मोर्चे पर डटे रहे। इसके बावजूद पार्टी अपनी पारंपरिक सीट बचाने में नाकाम रही। आमतौर पर उपचुनाव में सत्ता पक्ष को बढ़त मिलती है, लेकिन दतिया में यह समीकरण भी   
उपचुनाव में मिली हार का असर अब प्रदेश भाजपा संगठन पर भी दिख सकता है। उम्मीदवार चयन में मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की अहम भूमिका मानी जा रही थी। ऐसे में हार के बाद टिकट चयन, स्थानीय फीडबैक और चुनावी रणनीति को लेकर सवाल उठना तय है। पार्टी अब इस बात की समीक्षा करेगी कि आखिर कहां कमी रह गई, जिसके कारण मजबूत मानी जा रही सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई।

तीसरे उम्मीदवार ने भी बढ़ाई भाजपा की परेशानी
चुनावी नतीजे बताते हैं कि हार के पीछे सिर्फ एक वजह नहीं थी। जीत-हार का अंतर कम रहा। ऐसे में कम मतदान प्रतिशत, महिलाओं की अपेक्षाकृत कम भागीदारी, ग्रामीण और शहरी इलाकों में अलग-अलग मतदान रुझान और आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव की मौजूदगी जैसे कई कारकों ने मुकाबले को प्रभावित किया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन सभी कारणों ने मिलकर चुनाव को भाजपा के लिए और मुश्किल बना दिया।

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