कुरुक्षेत्र: प्रशांत किशोर की जीत भाजपा-राजद दोनों को कर देगी अशांत

विनोद अग्निहोत्री  Updated Mon, 03 Aug 2026 08:01 PM IST

Kurukshetra: Prashant kishor's victory will unsettle both BJP and the RJD

प्रशांत किशोर बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीते। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

यूं तो उपचुनावों के नतीजों से सरकारों की सेहत पर फर्क नहीं पड़ता और ज्यादातर सत्ताधारी दल का ही पलड़ा उपचुनावों में भारी रहता है।लेकिन जब सत्ताधारी दल उपचुनाव हारता है तो उसके कुछ संकेत जरूर होते हैं। बांकीपुर और दतिया में भाजपा की हार के अलग अलग मायने और संकेत हैं। बांकीपुर कोई मामूली सीट नहीं है। ये 1995 से भाजपा की अपराजेय सीट है बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की खानदानी सीट बन चुकी थी, जहां से पांच बार वो खुद और चार बार उनके पिता चुनाव जीते। ये सीट भाजपा तब हारी जब पहली बार राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं और पहली बार ही बिहार से आने वाले नितिन नवीन पार्टी अध्यक्ष हैं।

भाजपा ये सीट राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी राजद से नहीं बल्कि उन प्रशांत किशोर से हारी है जो राजनीति में महज तीन साल से हैं और 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी जनसुराज पार्टी महज चार फीसदी वोट ही पा सकी और एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। लेकिन प्रशांत किशोर ने न सिर्फ 19324 वोटों से जीत दर्ज की बल्कि राजद उम्मीदवार रेखा कुमारी को महज दस हजार से कुछ अधिक वोटों तक समेट दिया जबकि 2025 विधानसभा चुनावों में उन्हें 47 हजार से अधिक वोट मिले थे। इसलिए बांकीपुर का नतीजा भाजपा और राजद दोनों के लिए चिंता का विषय है।

प्रशांत किशोर की जीत महज एक व्यक्ति की नहीं एक संभावना की जीत है। ऐसी संभावना जिसने 2030 के विधानसभा चुनावों की झलक भी देखी जा सकती है। विधायक बनने के बाद प्रशांत किशोर चुप बैठने वाले नहीं हैं। अब एक तरफ विधानसभा में उनकी आवाज गूंजेगी वहां वो मुद्दों पर सरकार को घेरेंगे तो दूसरी तरफ सदन के बाहर वो बिहार में घूम घूम कर जन सुराज पार्टी को मजबूत करेंगे। उसे लेकर सड़क पर उतरेंगे और बिहार में सुशासन विकास पलायन सामाजिक सौहार्द के मुद्दों पर सार्वजनिक विमर्श तैयार करेंगे। कह सकते हैं बिहार को जातिवादी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से बाहर निकालेंगे
करीब चार दशक बाद बिहार की अगड़ी जातियों को प्रशांत किशोर के रूप में एक ऐसा प्रखर नेता मिला है जो राज्य में सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादी और राष्ट्रवाद के नाम पर मुस्लिम विरोध की राजनीति को विकास सुशासन रोजगार शिक्षा स्वास्थ्य के मुद्दों की राजनीति से चुनौती दे रहा है। अगर प्रशांत अपनी इस राजनीति का विस्तार सफलता पूर्वक कर पाते हैं तो भाजपा का परंपरागत सवर्ण जनाधार उनकी तरफ आ सकता है और अगर ऐसा हुआ तो राजद के एम वाई जनाधार से एम यानी मुस्लिम भी पीके के साथ अगर आ गया और इसमें जेडी-यू का अति पिछड़ा जुड़ गया तो 2030 के विधान सभा चुनाव में प्रशांत सभी स्थापित दलों को अशांत कर देंगे।
इसलिए बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत भाजपा और राजद दोनों के लिए खतरे की घंटी है। क्योंकि पीके बिहार की जनता को एक नया विकल्प दे रहे हैं जो जंगलराज के बोझ और परिवारवादी राजनीति से मुक्त है। बांकीपुर उपचुनाव हमे 1974 में हुए जबलपुर और 1977 के आजमगढ़ संसदीय उपचुनावों की याद दिलाता है जब जबलपुर में शरद यादव की जीत ने कांग्रेस की भावी पराजय की और आजमगढ़ से मोहसिना किदवई की जीत ने जनता पार्टी के पतन की शुरुआती पटकथा लिखी थी।

दतिया में कांग्रेस की जीत बीजेपी की अंतर्कलह के साथ साथ इसका भी संकेत है 2023 में इस सीट पर गृह मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा की हार के बावजूद पार्टी ने यहां कोई सबक नहीं लिया। दोनों ही सीटों पर भाजपा की हार पार्टी के आम कार्यकर्ता की इस भावना का प्रकटीकरण है कि लंबे समय तक उसे बंधुआ नहीं बनाया जा सकता। गुजरात के मांजलपुर की जीत से कुछ मरहम जरूर लगा है लेकिन कांग्रेस ने गुजरात को भाजपा के लिए खुला छोड़ दिया है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की प्राथमिकताओं में शायद गुजरात है ही नहीं।

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