पुरातत्वविदों के अनुसार, यह तलवार सैयद सालार की नौवीं पीढ़ी की वंशज और पेशे से वकील इत्रत जैदी के निजी संग्रह में सुरक्षित थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आज भी सुरक्षित मौजूद दुर्लभ मुगलकालीन हथियारों में शामिल हो सकती है।

फारसी शिलालेख से मिली प्रामाणिकता

सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाले वसीम खान ने बताया कि इस खोज की सबसे बड़ी विशेषता तलवार पर सोने से उकेरा गया फारसी शिलालेख है। शिलालेख में दर्ज है कि शाहजहां ने यह तलवार सैयद सालार को भेंट की थी।

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इस पर अंकित 'शमशीर आलेमानी बिन्ते शाहजहां बादशाह' का अर्थ है कि सम्राट ने प्रतीकात्मक रूप से इस तलवार को अपनी पुत्री मानकर सैयद सालार को सम्मानस्वरूप सौंपा।

शाहजहां की निजी तलवार से मिलती है समानता

विशेषज्ञों के मुताबिक इस तलवार की हल्की घुमावदार ब्लेड, सोने की जड़ाई, अलंकरण और डिस्कनुमा पोमेल इसे शाहजहां की निजी तलवार से काफी मिलता-जुलता बनाते हैं। ऐसी ही एक तलवार वर्ष 2007 में सोथबीज़ की नीलामी में प्रदर्शित हुई थी, जिसकी कीमत लगभग 717,800 डॉलर रही थी।

बताया गया कि शाहजहां की निजी तलवार वर्तमान में दोहा के इस्लामी कला संग्रहालय में सुरक्षित है। उस तलवार पर छत्र, कमल और खसखस के अलंकरण बने हैं तथा उसका समय इस्लामी कैलेंडर के 1047 हिजरी (1637-1638 ईस्वी) का माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि करेरा में मिली तलवार की खोज इतिहास के कई नए पहलुओं पर शोध का आधार बन सकती है।