एक्सप्लेनर: एसआईआर के बीच जिन चेहरों पर मचा घमासान, वो कौन; कैसा है तीनों चुनाव आयुक्तों का ट्रैक रिकॉर्ड?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Wed, 23 Sep 2026 05:09 PM IST

एसआईआर पर उठे सवालों के बीच चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों की भूमिका और उनका पिछला प्रशासनिक सफर चर्चा में है। एक ओर दो आयुक्तों की लिखित आपत्तियों की खबर सामने आई, तो दूसरी ओर आयोग ने इसे सामान्य आंतरिक प्रक्रिया बताते हुए सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही। ऐसे में जानिए इन तीनों अधिकारियों का प्रोफाइल और चुनाव आयोग तक पहुंचने से पहले कैसा रहा उनका सफर।

Explainer: Who Are the Three Election Commissioners at the Centre of the SIR Row; What Is Their Track Record?

चुनाव आयोग के अधिकारी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की खबर इस वक्त सुर्खियों में है। कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग के तीनों चुनाव आयुक्तों में मतभेद हैं। चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे सामान्य आंतरिक प्रक्रिया बताते हुए सभी फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है। 

आखिर ये पूरा मामला क्या है? चुनाव आयोग ने अपनी सफाई में क्या कहा है? मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की क्या भूमिका होती है? आयोग में शामिल तीनों अधिकारी कौन हैं? ये तीनों चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग में आने से पहले किन-किन पदों पर रह चुके हैं? आइये जानते हैं..

क्या है पूरा मामला?

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई। इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता सूची से जुड़े सूचना-तकनीक तंत्र के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों से बताया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ कदमों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया। हालांकि, इन खबरों के बीच निर्वाचन आयोग ने चुनाव आयुक्तों के बीच किसी भी तरह का मतभेद होने से इनकार किया है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी कर अपना पक्ष रखा। आयोग ने कहा कि वह संविधान के तहत काम करता है और एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। आयोग के मुताबिक, उसके भीतर लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी राय और आंतरिक जांच-पड़ताल सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं

आयोग ने कहा कि पिछले 10 महीनों के दौरान सामने आए कुछ चुनिंदा आंतरिक नोट्स या टिप्पणियों को ही सामने रखने से पूरी तस्वीर नहीं दिखती। उसके मुताबिक, इसी अवधि में बड़ी संख्या में मंजूरियां, फैसले, निर्देश और नई पहल भी की गईं।

आयोग ने बताया कि हाल के महीनों में करीब 40 नई पहल शुरू की गई हैं और कई चुनावी सुधार किए गए हैं। इनमें देशभर में मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया, जिसमें एसआईआर भी शामिल है, प्रमुख है। आयोग का दावा है कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले आयोग के सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

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चुनाव आयोग के अधिकारी - फोटो : Amar Ujala

एसआईआर क्या है?

एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण मतदाता सूची को दोबारा जांचने और अद्यतन करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में पात्र लोगों के नाम बने रहें और मृत, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके, दो जगह दर्ज या अन्य कारणों से अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें।

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की क्या भूमिका होती है?

भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जो लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करती है। आयोग के पास चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े कामों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी होती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी और चुनाव आयुक्त यानी ईसी मिलकर आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं। सीईसी आयोग के प्रमुख होते हैं, जबकि अन्य दो चुनाव आयुक्त भी निर्णय प्रक्रिया में बराबर की भूमिका निभाते हैं।

आयोग की जिम्मेदारियों में मतदाता सूची तैयार करना और उसका पुनरीक्षण, चुनाव कार्यक्रम तय करना, मतदान और मतगणना से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी और पूरी चुनाव प्रक्रिया का संचालन शामिल है। चुनाव के दौरान राज्य और जिला स्तर की चुनावी मशीनरी आयोग के निर्देशन और नियंत्रण में काम करती है।

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मुख्य चुनाव आयुक्त - फोटो : Amar Ujala

कौन हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार?

ज्ञानेश कुमार का जन्म 27 जनवरी 1964 को आगरा में हुआ था। उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। इसके अलावा उन्होंने आईसीएफएआई, भारत से बिजनेस फाइनेंस और अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पर्यावरण अर्थशास्त्र की पढ़ाई की।

वह 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने केरल सरकार में अडूर के सब कलेक्टर, अनुसूचित जाति और जनजाति विकास निगम के प्रबंध निदेशक, कोच्चि नगर निगम के नगर आयुक्त, केरल स्टेट कोऑपरेटिव बैंक के प्रबंध निदेशक और एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर जैसे पदों पर काम किया। 

वह गोश्री आइलैंड्स डेवलपमेंट अथॉरिटी के सचिव, तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट डेवलपमेंट सोसाइटी के प्रबंध निदेशक और नई दिल्ली स्थित केरल हाउस में रेजिडेंट कमिश्नर भी रहे।

केरल सरकार में सचिव रहते हुए उन्होंने वित्त संसाधन, फास्ट ट्रैक प्रोजेक्ट्स, लोक निर्माण विभाग, सरकार के आधुनिकीकरण कार्यक्रम और खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों जैसे विभागों को संभाला।

केंद्र सरकार में उन्होंने रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव, संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव और सहकारिता मंत्रालय में सचिव के तौर पर काम किया। 

जम्मू-कश्मीर से लेकर राम जन्मभूमि ट्रस्ट तक भूमिका

गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के पद पर रहते हुए ज्ञानेश कुमार जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामलों को देख रहे थे। इसी दौरान 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को रद्द करने की घोषणा हुई थी।
अनुच्छेद 370 को रद्द करने से जुड़े कानून को संसद में लाए जाने के दौरान वह तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह के साथ लगातार संसद में आते थे। उन्हें जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक तैयार करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी।
गृह मंत्रालय में रहते हुए वह श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से जुड़े काम में भी शामिल थे। ट्रस्ट के गठन से संबंधित कानूनी और प्रशासनिक काम को अंतिम रूप देने में उन्होंने भूमिका निभाई थी। केंद्र सरकार ने उन्हें अपने प्रतिनिधि के रूप में ट्रस्ट का पदेन यानी एक्स-ऑफिशियो सदस्य नियुक्त किया था। इसके अलावा उन्होंने तीन तलाक कानून के मसौदे को तैयार करने में भी भूमिका निभाई थी।

रिटायरमेंट के दो महीने बाद बने चुनाव आयुक्त

ज्ञानेश कुमार 31 जनवरी 2024 को सेवानिवृत्त हुए। इसके करीब दो महीने बाद 14 मार्च 2024 को उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया। अगले ही दिन यानी 15 मार्च 2024 को चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा की।

चुनाव आयुक्त बनने के करीब एक साल बाद 19 फरवरी 2025 को उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया। वह भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनका कार्यकाल 2029 तक होगा। ज्ञानेश कुमार से पहले राजीव कुमार भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। वे 15 मई 2022 से 18 फरवरी 2025 तक 25वें सीईसी रहे।

नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले सीईसी बने

ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत हुई। वह इस नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने।
इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति 1991 में बने कानूनों के तहत होती थी। नियुक्ति की सिफारिश तीन सदस्यों वाली समिति करती थी। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते थे।
नए कानून में मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटा दिया गया। अब तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य होते हैं और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य होता है।

ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में कौन-कौन से चुनाव?

ज्ञानेश कुमार के चार साल के कार्यकाल के दौरान 20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में चुनाव होंगे। इस दौरान 2027 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी उनके कार्यकाल में होंगी। अंतिम चुनाव मिजोरम में होगा।

ज्ञानेश कुमार के परिवार में कौन-कौन?

ज्ञानेश कुमार के पिता सुबोध कुमार गुप्ता मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके भाई आईआरएस अधिकारी हैं और बहन इंदौर में एक स्कूल चलाती हैं। उनकी बेटी मेधा रूपम नोएडा की जिलाधिकारी हैं और दामाद मनीष बंसल 2014 बैच के आईएएस अधिकारी हैं।

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चुनाव आयुक्त - फोटो : Amar Ujala

कौन हैं चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू?

डॉ. सुखबीर सिंह संधू ने 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त का पद संभाला। वह 1988 बैच के उत्तराखंड कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। इससे पहले वह जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे। इससे पहले करीब दो साल तक 2019 से 2021 के बीच भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई के अध्यक्ष रहे।
उन्होंने कुछ समय भारत के लोकपाल के सचिव के तौर पर भी काम किया। केंद्र सरकार में वह उच्च शिक्षा विभाग में अतिरिक्त सचिव रहे, जहां आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से जुड़े काम देखते थे।
उन्होंने 2007 से 2014 के बीच करीब आठ वर्षों तक तीन अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े चार मुख्यमंत्रियों के प्रमुख सचिव के रूप में काम किया।

एनएचएआई में क्या काम किया?

एनएचएआई में उनके कार्यकाल के दौरान 30 हजार करोड़ रुपये की मध्यस्थता संबंधी विवादों को सुलह के जरिए हल किया गया। इसी दौरान राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल वसूली के लिए फास्टैग को अनिवार्य रूप से लागू किया गया। इससे देश को सालाना करीब 35 हजार करोड़ रुपये की बचत होने का दावा किया गया। उनके कार्यकाल में एनएचएआई को अधिक डिजिटल, ड्रोन से निगरानी वाली और पोर्टल आधारित संस्था बनाया गया।

उत्तराखंड सरकार में भूमिका

उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहते हुए अलग-अलग विभागों की 35 नीतियों में बदलाव किए गए, जिनका उद्देश्य उन्हें ज्यादा प्रभावी और लोगों के लिए सुविधाजनक बनाना था। इसके साथ बेहतर सेवा वितरण, निवेश बढ़ाने और रोजगार सृजन पर भी जोर दिया गया।
उन्होंने उत्तराखंड, पंजाब और उत्तर प्रदेश सरकार में भी अलग-अलग पदों पर काम किया। इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, हाईवे, पीपीपी प्रोजेक्ट्स, शहरी विकास, बिजली, उद्योग और वित्त जैसे विभागों में सचिव के तौर पर काम किया। वह हरिद्वार, गौतम बुद्ध नगर यानी नोएडा और ऊधम सिंह नगर के कलेक्टर या जिलाधिकारी भी रह चुके हैं।
सुखबीर सिंह संधू ने एमबीबीएस की पढ़ाई की है और इतिहास में मास्टर डिग्री हासिल की है। वह हॉकी खिलाड़ी भी रहे हैं और ट्रैकिंग और पर्वतारोहण में रुचि रखते हैं। उन्होंने उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में 22 हजार फीट ऊंची ब्लैक पीक पर चढ़ाई भी की है।
उन्हें अमेरिका के बोस्टन स्थित हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में भारतीय शहरों को तनावमुक्त बनाने यानी 'डी-स्ट्रेसिंग इंडियन सिटीज' विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने शहरी सुधार और नगर प्रबंधन से जुड़े विषयों पर शोध पत्र भी प्रकाशित किए हैं।
संधू से पहले चुनाव आयुक्त के पद पर अरुण गोयल और अनूप चंद्र पांडे थे। अनूप चंद्र पांडे 14 फरवरी 2024 को सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि अरुण गोयल ने 9 मार्च 2024 को पद से इस्तीफा दिया था।
हाल ही में संधू को दिल्ली कैंट विधानसभा क्षेत्र में नोटिस दिया गया। उनके मामले में नोटिस की वजह नाम में विसंगति बताई गई। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के अनुसार, न्यूमेरेशन फॉर्म में दी गई जानकारी को पिछली मतदाता सूची से मिलाते समय यह विसंगति सामने आई थी। बाद में संधू की ओर से दिए गए विवरण और दस्तावेजों का सत्यापन किया गया। उनकी एंट्री को वैलिडेट कर दिया गया और उसे अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए रखा गया है। 

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चुनाव आयुक्त - फोटो : Amar Ujala

कौन हैं चुनाव आयुक्त विवेक जोशी?

डॉ. विवेक जोशी ने 19 फरवरी 2025 को चुनाव आयुक्त का पद संभाला। वह 1989 बैच के हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा में 35 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और उनका जन्म 21 मई 1966 को हुआ था।

चुनाव आयोग में आने से पहले वह हरियाणा के मुख्य सचिव थे। इससे पहले केंद्र सरकार में उन्होंने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव, वित्तीय सेवा विभाग के सचिव और भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त के तौर पर काम किया। उन्होंने कपड़ा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और वित्त मंत्रालय समेत कई विभागों में भी काम किया।

हरियाणा सरकार में उन्होंने जींद, हिसार और पंचकूला के उपायुक्त और अंबाला मंडल के मंडलायुक्त के तौर पर काम किया। वह राज्य वित्त आयोग के सदस्य सचिव भी रहे। विवेक जोशी भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक के बोर्ड में सदस्य के तौर पर भी काम कर चुके हैं।

उन्होंने स्विट्जरलैंड के ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट, जेनेवा से अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र में पीएचडी और मास्टर डिग्री की है। इसके अलावा उन्होंने भारतीय विदेश व्यापार संस्थान, नई दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय कारोबार में एग्जीक्यूटिव मास्टर डिग्री हासिल की। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की, जिसे अब आईआईटी रुड़की के नाम से जाना जाता है, से 1987 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई किया था।


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